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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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(ञ) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता इसी शरीर के अन्तराल में अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ पुरातन हैं- दैवी सम्पद् और आसुरी सम्पद्। दैवी सम्पद् में हैं- पुण्यरूपी पाण्डु और कर्त्तव्यरूपी कुन्ती। पुण्य जागृत होने से पहले मनुष्य जो कुछ भी कर्त्तव्य समझकर करता है, अपनी समझ से वह कर्त्तव्य ही करता है; किन्तु उससे कर्त्तव्य होता नहीं- क्योंकि पुण्य के बिना कर्त्तव्य को समझा ही नहीं जा सकता। कुन्ती ने पाण्डु से सम्बन्ध होने से पूर्व जो कुछ भी अर्जित किया, वह था 'कर्ण'। आजीवन कुन्ती के पुत्रों से लड़ता रह गया। पाण्डवों का दुर्धर्ष शत्रु यदि कोई था, तो वह था 'कर्ण'। विजातीय कर्म ही कर्ण है जो बन्धनकारी है, जिससे परम्परागत रूढ़ियों का चित्रण होता है- पूजा-पद्धतियाँ पिण्ड नहीं छोड़तीं। पुण्य जागृत होने पर धर्मरूपी 'युधिष्ठिर', अनुरागरूपी 'अर्जुन', भावरूपी 'भीम', नियमरूपी 'नकुल', सत्संगरूपी 'सहदेव', सात्त्विकतारूपी 'सात्यकि', काया में सामर्थ्यरूपी 'काशिराज', कर्त्तव्य के द्वारा भव पर विजय 'कुन्तिभोज' इत्यादि इष्टोन्मुखी मानसिक प्रवृत्तियों का उत्कर्ष होता है, जिनकी गणना सात अक्षौहिणी है। 'अक्ष' दृष्टि को कहते हैं। सत्यमयी दृष्टिकोण से जिसका गठन है, वह है दैवी सम्पद्। परमधर्म परमात्मा तक की दूरी तय करानेवाली ये सात सीढ़ियाँ 'सात भूमिकाएँ' हैं, न कि कोई गणना-विशेष। वस्तुतः ये प्रवृत्तियाँ अनन्त हैं। दूसरी ओर है 'कुरुक्षेत्र', जिसमें दस इन्द्रियाँ और एक मन ग्यारह अक्षौहिणी सेना है। मनसहित इन्द्रियमयी दृष्टिकोण से जिसका गठन है, वह है आसुरी सम्पद्। जिसमें हैं अज्ञानरूपी 'धृतराष्ट्र' जो सत्य जानते हुए भी अन्धा बना रहता है, उसकी सहचारिणी है 'गान्धारी'- इन्द्रिय आधारवाली प्रवृत्ति। इनके साथ हैं- मोहरूपी 'दुर्योधन', दुर्बुद्धिरूपी 'दुःशासन', विजातीय कर्मरूपी 'कर्ण', भ्रमरूपी 'भीष्म', द्वैत के आचरणरूपी 'द्रोणाचार्य', आसक्तिरूपी 'अश्वत्थामा', विकल्परूपी 'विकर्ण', अधूरी साधना में कृपा के आचरणरूपी 'कृपाचार्य' और इन सबके बीच जीवरूपी विदुर है, जो रहता है अज्ञान में किन्तु दृष्टि सदैव पाण्डवों पर है, पुण्य से प्रवाहित प्रवृत्ति पर है; क्योंकि आत्मा परमात्मा का शुद्ध अंश है। इस प्रकार आसुरी सम्पद् भी अनन्त है। क्षेत्र एक ही है- यह शरीर, इसमें लड़नेवाली प्रवृत्तियाँ दो हैं। एक प्रकृति में विश्वास दिलाती है, नीच-अधम योनियों का कारण बनती है, तो दूसरी परमपुरुष