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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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२८८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जब यह जीवात्मा सत्त्वगुण के वृद्धिकाल में मृत्यु को प्राप्त होता है, शरीर-त्याग करता है, तब उत्तम कर्म करनेवालों के मलरहित दिव्य लोकों को प्राप्त होता है। तथा- रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते। तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते।।१५।। रजोगुण की वृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त होनेवाला कर्मों की आसक्तिवाले मनुष्यों में जन्म लेता है तथा तमोगुण की वृद्धि में मरा हुआ पुरुष मूढ़ योनियों में जन्म लेता है, जिसमें कीट-पतंगादिपर्यन्त योनियों का विस्तार है। अतः गुणों में भी मनुष्यों को सात्त्विक गुणोंवाला होना चाहिये। प्रकृति का यह बैंक आपके अर्जित गुणों को मृत्यु के उपरान्त भी उन्हें आपको सुरक्षित लौटाता है। अब देखें इसका परिणाम- कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्। रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्।।१६।। सात्त्विक कर्म का फल सात्त्विक, निर्मल, सुख, ज्ञान और वैराग्यादि कहा गया है। राजस कर्म का फल दुःख और तामस कर्म का फल अज्ञान है। तथा- सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च।।१७।। सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है (ईश्वरीय अनुभूति का नाम ज्ञान है), ईश्वरीय अनुभूति का प्रवाह होता है। रजोगुण से निःसन्देह लोभ उत्पन्न होता है तथा तमोगुण से प्रमाद, मोह, आलस्य (अज्ञान) ही उत्पन्न होता है। ये उत्पन्न होकर कौन-सी गति देते हैं?- ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः।।१८।। सत्त्वगुण में स्थित हुआ पुरुष 'ऊर्ध्वमूलम्'- उस मूल परमात्मा की