BharatKosha
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

Page 325 of 429

Read in context
Page 325

२९० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किन प्रकार के आचरणोंवाला होता है तथा मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है? श्रीभगवानुवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव। न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२॥ अर्जुन के उपर्युक्त तीनों प्रश्नों का उत्तर देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप ईश्वरीय प्रकाश, रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति और तमोगुण के कार्यरूप मोह को न तो प्रवृत्त होने पर बुरा समझता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा ही करता है। तथा- उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते। गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥२३॥ जो इस प्रकार उदासीन के सदृश स्थित हुआ गुणों द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता, गुण गुण में ही बरतते हैं- ऐसा यथार्थतः जानकर उस स्थिति से चलायमान नहीं होता, तभी वह गुणों से अतीत होता है। समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः। तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४॥ जो निरन्तर स्वयं में अर्थात् आत्मभाव में स्थित है, सुख और दुःख में सम है, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में भी समान भाववाला है, धैर्यवान् है, जो प्रिय और अप्रिय को बराबर समझता है, अपनी निन्दा तथा स्तुति में भी समान भाववाला है और- मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५॥ जो मान और अपमान में सम है, मित्र और शत्रु-पक्ष में भी सम है, वह सम्पूर्ण आरम्भों से रहित हुआ पुरुष गुणातीत कहा जाता है।