यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextषोडश अध्याय ३१३ योनियों में गिरने का क्रम कितना दुःखद है। अतः दैवी सम्पद् के लिये प्रयत्नशील रहना चाहिये। आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥२०॥ कौन्तेय! मूर्ख मनुष्य जन्म-जन्मान्तरों तक आसुरी योनि को प्राप्त हुए मुझे न प्राप्त होकर पहले से भी अति नीच गति को प्राप्त होते हैं, जिसका नाम नरक है। अब देखें, नरक का उद्गम क्या है?– त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥२१॥ काम, क्रोध और लोभ ये तीन प्रकार के नरक के मूल द्वार हैं। ये आत्मा का नाश करनेवाले, उसे अधोगति में ले जानेवाले हैं। अतः इन तीनों को त्याग देना चाहिये। इन्हीं तीनों पर आसुरी सम्पद् टिकी हुई है। इन्हें त्यागने से लाभ?– एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः। आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२॥ कौन्तेय! नरक के इन तीनों द्वारों से मुक्त हुआ पुरुष अपने परमकल्याण के लिये आचरण कर पाता है, जिससे वह परमगति अर्थात् मेरे को प्राप्त होता है। इन तीनों विकारों को त्यागने पर ही मनुष्य नियत कर्म करता है, जिसका परिणाम परमश्रेय है। यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३॥ जो पुरुष उपर्युक्त शास्त्रविधि को त्यागकर [वह शास्त्र कोई अन्य नहीं, ‘इति गुह्यतमं शास्त्रम्’ ( १५/२०) गीता स्वयं पूर्णशास्त्र है, जिसे स्वयं श्रीकृष्ण ने बताया है, उस विधि को त्यागकर] अपनी इच्छा से बरतता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही प्राप्त होता है। तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥२४॥