यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextप्राक्कथन (ड) ही 'अर्जुन' है, जो आपके हृदय की भावना-विशेष है। अनुरागविहीन पुरुष न कभी पूर्व में देख सका है और न अनुरागविहीन पुरुष भविष्य में कभी देख सकेगा- 'मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।।' (रामचरितमानस, ७/६१/१) अतः अर्जुन एक प्रतीक है। यदि प्रतीक नहीं है तो गीता का पीछा छोड़ दें, गीता आपके लिये नहीं है; क्योंकि उस दर्शन की योग्यता अर्जुन तक ही सीमित रह गयी। अध्याय के अन्त में योगेश्वर निर्णय देते हैं- "अर्जुन ! अनन्य भक्ति और श्रद्धा द्वारा मैं इस प्रकार प्रत्यक्ष देखने के लिये (जैसा तूने देखा), तत्त्व से स्पष्ट जानने के लिये और प्रवेश करने के लिये भी सुलभ हूँ।" अनन्य भक्ति अनुराग का ही दूसरा रूप है और यही अर्जुन का स्वरूप भी है। अर्जुन पथिक का प्रतीक है। इस प्रकार गीता के पात्र प्रतीकात्मक हैं। यथास्थान उनका संकेत है। रहे हों कोई ऐतिहासिक श्रीकृष्ण और अर्जुन, निश्चय ही हुआ हो कोई विश्वयुद्ध; किन्तु गीता में भौतिक युद्ध का चित्रण कदापि नहीं है। उस ऐतिहासिक युद्ध के मुहाने पर घबड़ाया तो था अर्जुन, न कि सेना; सेना तो लड़ने को तैयार खड़ी थी। क्या गीता का उपदेश देकर श्रीकृष्ण ने सव्यसाची अर्जुन को सेना की योग्यता का बनाया? वस्तुतः साधन लिखने में नहीं आता। सब कुछ पढ़ लेने के बाद भी चलना शेष ही रहता है। यही प्रेरणा 'यथार्थ गीता' है। श्री गुरु पूर्णिमा सद्गुरु कृपाश्रयी, जगद्बन्धु २४ जुलाई, १९८३ ई० स्वामी अड़गड़ानन्द