यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context३२० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता रूप से स्थित मुझ परमात्मा को दुर्बल करनेवाले हैं, मुझसे दूरी पैदा करते हैं न कि भजते हैं। उनको तू असुर जान अर्थात् देवताओं को पूजनेवाले भी असुर ही हैं। इससे अधिक कोई क्या कहेगा? अतः जिसके ये सभी अंशमात्र हैं, उन मूल एक परमात्मा का भजन करें। इसी पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बारम्बार बल दिया है। आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु।।७।। अर्जुन! जैसे श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, वैसे ही सबको अपनी- अपनी प्रकृति के अनुसार भोजन भी तीन प्रकार का प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके भेद को तू मुझसे सुन। पहले प्रस्तुत है आहार- आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः।।८।। आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ानेवाले; रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहनेवाले तथा स्वभाव से ही हृदय को प्रिय लगनेवाले भोज्य पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, स्वभाव से हृदय को प्रिय लगनेवाला, बल, आरोग्य, बुद्धि और आयु बढ़ानेवाला भोज्य पदार्थ ही सात्त्विक है। जो भोज्य पदार्थ सात्त्विक है, वही सात्त्विक मनुष्य को प्रिय होता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि कोई भी खाद्य वस्तु सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी नहीं होती, उसका प्रयोग सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी हुआ करता है। न दूध सात्त्विक है, न प्याज राजसी और न लहसुन तामसी है। जहाँ तक बल, बुद्धि, आरोग्य और हृदय को प्रिय लगने का प्रश्न है, तो विश्वभर में मनुष्यों को अपनी-अपनी प्रकृति, वातावरण और परिस्थितियों के अनुकूल विभिन्न खाद्य सामग्रियाँ प्रिय होती हैं, जैसे- बंगालियों तथा मद्रासियों को चावल प्रिय होता है और पंजाबियों को रोटी। एक ओर तो अरबवासियों