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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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३२२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जो भोजन देर का बना हुआ है, 'गतरसं'– रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी, उच्छिष्ट (जूठा) और अपवित्र भी है, वह तामस पुरुष को प्रिय होता है। प्रश्न पूरा हुआ। अब प्रस्तुत है 'यज्ञ'– अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११॥ जो यज्ञ 'विधिदृष्टः'– शास्त्रविधि से निर्धारित किया गया है (जैसा पीछे अध्याय ३ में यज्ञ का नाम लिया, अध्याय ४ में यज्ञ का स्वरूप बताया कि बहुत से योगी प्राण को अपान में, अपान को प्राण में हवन करते हैं। प्राण– अपान की गति निरोध कर प्राणों की गति स्थिर कर लेते हैं, संयमाग्नि में हवन करते हैं। इस प्रकार यज्ञ के चौदह सोपान बताये, जो सब-के-सब ब्रह्म तक की दूरी तय करा देनेवाली एक ही क्रिया की ऊँची–नीची अवस्थाएँ हैं। संक्षेप में यज्ञ चिन्तन की प्रक्रिया का चित्रण है, जिसका परिणाम सनातन ब्रह्म में प्रवेश है। जिसका विधान इस शास्त्र में किया गया है।) उसी शास्त्र-विधान पर पुनः बल देते हैं कि अर्जुन ! शास्त्रविधि से नियत किये हुए, जिसे करना ही कर्त्तव्य है तथा जो मन का निरोध करनेवाला है, जो फल को न चाहनेवाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ सात्त्विक है। अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२॥ हे अर्जुन ! जो यज्ञ केवल दम्भाचरण के लिये ही हो या फल को उद्देश्य बनाकर किया जाता है, उसे राजस यज्ञ जान। यह कर्त्ता यज्ञ की विधि जानता है; किन्तु दम्भाचरण या फल को उद्देश्य बनाकर करता है कि अमुक वस्तु मिलेगी तथा लोग देखें कि यज्ञ करता है– प्रशंसा करेंगे, ऐसा यज्ञकर्त्ता वस्तुतः राजसी है। अब तामस यज्ञ का स्वरूप बताते हैं– विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३॥ जो यज्ञ शास्त्रविधि से रहित है, जो अन्न (परमात्मा) की सृष्टि कर