यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context३२४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता फल को न चाहते हुए अर्थात् निष्काम कर्म से युक्त पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किये हुए उपर्युक्त तीनों तपों को मिलाकर सात्त्विक तप कहते हैं। अब प्रस्तुत है राजस तप- सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्। क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८॥ जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये अथवा केवल पाखण्ड से ही किया जाता है, वह अनिश्चित एवं चंचल फलवाला तप राजस कहा गया है। मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९॥ जो तप मूर्खतापूर्वक हठ से; मन, वाणी और शरीर के पीडासहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिये बदले की भावना से किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है। इस प्रकार सात्त्विक तप में शरीर, मन और वाणी को मात्र इष्ट के अनुरूप ढालना है। राजस तप में तप की क्रिया वही है; किन्तु दम्भमान सम्मान की इच्छा से तपते हैं। प्रायः महात्मा लोग घर-बार छोड़ने के बाद भी इस विकार के शिकार हो जाते हैं और तीसरा तामस तप अविधिपूर्वक होता है, दूसरों को पीड़ा पहुँचाने के दृष्टिकोण से होता है। अब प्रस्तुत है दान- दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२०॥ दान देना ही कर्त्तव्य है- इस भाव से जो दान देश (स्थान), काल (समयानुकूल) और सत्यपात्र के प्राप्त होने पर बदले में उपकार की भावना से रहित होकर दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है। यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१॥ जो दान क्लेशपूर्वक (जो देते नहीं बनता लेकिन देना पड़ रहा है) तथा प्रत्युपकार की भावना से कि यह करूँगा तो यह मिलेगा अथवा फल को