यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextअष्टादश अध्याय ३४३ फलइ अघाइ।' अस्तु, सर्वव्यापक प्रभु का स्मरण करें, जिसकी पूर्ति के लिये सद्गुरु की शरण, निष्कपट भाव से प्रश्न और सेवा एकमात्र उपाय है। आसुरी और दैवी सम्पद् अन्तःकरण की दो वृत्तियाँ हैं। जिसमें दैवी सम्पद् परमदेव परमात्मा का दिग्दर्शन कराती है, इसलिये दैवी कही जाती है; किन्तु यह भी तीनों गुणों के ही अन्तर्गत है। गुण शान्त होने के पश्चात् इनकी भी शान्ति हो जाती है। तत्पश्चात् उस आत्मतृप्त योगी के लिये कोई भी कर्त्तव्य शेष नहीं रह जाता। अब प्रस्तुत है पीछे से आरम्भ हुआ प्रश्न वर्ण-व्यवस्था। वर्ण जन्म- प्रधान है अथवा कर्मों से पायी जानेवाली अन्तःकरण की योग्यता का नाम है? इस पर देखें- ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१॥ हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किये गये हैं। स्वभाव में सात्त्विक गुण होगा तो आप में निर्मलता होगी, ध्यान-समाधि की क्षमता होगी। तामसी गुण होगा तो आलस्य, निद्रा, प्रमाद रहेगा। उसी स्तर से आपसे कर्म भी होगा। जो गुण कार्यरत है, वही आपका वर्ण है, स्वरूप है। इसी प्रकार अर्द्ध-सात्त्विक और अर्द्ध-राजस से एक वर्ग क्षत्रिय का है और आधा से कम तामस तथा विशेष राजस से द्वितीय वर्ग वैश्य का है। इस प्रश्न को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यहाँ चौथी बार लिया है। अध्याय दो में इन चार वर्णों में से एक क्षत्रिय का नाम लिया कि क्षत्रिय के लिये युद्ध से श्रेयतर कोई मार्ग नहीं है। तीसरे अध्याय में उन्होंने कहा कि दुर्बल गुणवाले के लिये भी उसके स्वभाव से उत्पन्न योग्यता के अनुसार धर्म में प्रवृत्त होना, उसमें मर जाना भी परम कल्याणकारी है। दूसरों की नकल करना भयावह है। अध्याय चार में बताया कि चार वर्णों की सृष्टि मैंने की। तो क्या मनुष्यों को चार जातियों में बाँटा? कहते हैं- नहीं, ‘गुणकर्म विभागशः’- गुणों की योग्यता से कर्म को चार सोपानों में बाँटा। यहाँ गुण एक पैमाना है, उसके द्वारा