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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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३४६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता क्रमशः चलकर वह वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मणपर्यन्त दूरी तय करके, वर्णों को भी पार करके ब्रह्म में प्रवेश पा जायेगा। स्वभाव परिवर्तनशील है। स्वभाव के परिवर्तन के साथ वर्ण-परिवर्तन हो जाता है। वस्तुतः ये वर्ण अति उत्तम, उत्तम, मध्यम और निकृष्ट चार अवस्थाएँ हैं, कर्मपथ पर चलनेवाले साधकों की ऊँची-नीची चार सीढ़ियाँ हैं। कर्म एक ही है, नियत कर्म। श्रीकृष्ण कहते हैं कि परमसिद्धि की प्राप्ति का यही एक रास्ता है कि स्वभाव में जैसी योग्यता है, वहीं से लगे। इसको देखें- स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।४५।। अपने-अपने स्वभाव में पायी जानेवाली योग्यता के अनुसार कर्म में लगा हुआ मनुष्य 'संसिद्धिम्'- भगवत्प्राप्तिरूपी परमसिद्धि को प्राप्त होता है। पहले भी कह आये हैं-इस कर्म को करके तू परमसिद्धि को प्राप्त होगा। कौन-सा कर्म करके? अर्जुन! तू शास्त्रविधि से निर्धारित कर्म यज्ञार्थ कर्म कर। अब स्वकर्म करने की क्षमता के अनुसार कर्म में लगा हुआ मनुष्य परमसिद्धि को जिस प्रकार प्राप्त होता है, वह विधि तू मुझसे सुन। ध्यान दें- यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।४६।। जिस परमात्मा से सब भूतों की उत्पत्ति हुई है, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वर को 'स्वकर्मणा'- अपने स्वभाव से उत्पन्न हुए कर्म के द्वारा अर्चन कर मानव परमसिद्धि को प्राप्त होता है। अतः परमात्मा की भावना, परमात्मा का ही सर्वांगीण अर्चन और क्रमशः चलना आवश्यक है। जैसे, कोई बड़ी कक्षा में बैठ जाय तो छोटी भी खो देगा और बड़ी तो मिलेगी ही नहीं। अतः इस कर्मपथ पर सोपानशः चलने का विधान है। जैसे ३/३५ में। इसी पर पुनः बल देते हुए कहते हैं कि आप अल्पज्ञ ही क्यों न हों, वहीं से आरम्भ करें। वह विधि है- परमात्मा के प्रति समर्पण। श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।४७।।

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