यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context३५० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता अतः गीता का दृढ़ निश्चय है कि संन्यास और निष्काम कर्मयोग दोनों ही परिस्थितियों में परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को पाने के लिये नियत कर्म (चिन्तन) अनिवार्य है। अब तक तो संन्यासी के लिये भजन-चिन्तन पर बल दिया और अब समर्पण कहकर उसी वार्त्ता को निष्काम कर्मयोगी के लिये भी कहते हैं- सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।।५६।। मुझ पर विशेष रूप से आश्रित हुआ पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ, लेशमात्र भी त्रुटि न रखकर करता हुआ मेरे कृपा-प्रसाद से शाश्वत अविनाशी परमपद को प्राप्त होता है। कर्म वही है- नियत कर्म, यज्ञ की प्रक्रिया। पूर्ण योगेश्वर सद्गुरु के आश्रित साधक उनके कृपा-प्रसाद से शीघ्र पा जाता है। अतः उसे पाने के लिये समर्पण आवश्यक है। चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव।।५७।। अतः अर्जुन ! सम्पूर्ण कर्मों को (जितना कुछ तुझसे बन पड़ता है) मन से मुझे अर्पित करके, अपने भरोसे नहीं बल्कि मुझे समर्पण करके मेरे परायण हुआ बुद्धियोग अर्थात् योग की बुद्धि का अवलम्बन करके निरन्तर मुझमें चित्त लगा। योग एक ही है, जो सर्वथा दुःखों का अन्त करनेवाला और परमतत्त्व परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाला है। उसकी क्रिया भी एक ही है- यज्ञ की प्रक्रिया, जो मन तथा इन्द्रियों के संयम, श्वास-प्रश्वास तथा ध्यान इत्यादि पर निर्भर है। जिसका परिणाम भी एक ही है- 'यान्ति ब्रह्म सनातनम्।' इसी पर आगे कहते हैं- मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।५८।। इस प्रकार मुझमें निरन्तर चित्त को लगानेवाला होकर तू मेरी कृपा से मन और इन्द्रियों के सम्पूर्ण दुर्गों को अनायास ही तर जायेगा। 'इन्द्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।। आवत देखहिं बिषय