यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextप्रथम अध्याय ९ आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति।' (बृहदारण्यक उप०, ४/४/६)-जो कामनाओं से रहित आत्मा में स्थिर आत्मस्वरूप है, उसका कभी पतन नहीं होता। वह ब्रह्म के साथ एक हो जाता है।] आरम्भ में इच्छाएँ अनन्त होती हैं और अन्ततोगत्वा परमात्म-प्राप्ति की इच्छा शेष रहती है। जब यह इच्छा भी पूरी हो जाती है, तब इच्छा भी मिट जाती है। यदि उससे भी बड़ी कोई वस्तु होती तो आप उसकी इच्छा अवश्य करते। जब उससे आगे कोई वस्तु है ही नहीं तो इच्छा किसकी होगी? जब प्राप्त होने योग्य कोई वस्तु अप्राप्य न रह जाय तो इच्छा भी समूल नष्ट हो जाती है और इच्छा के मिटते ही भ्रम का सर्वथा अन्त हो जाता है। यही भीष्म की इच्छा-मृत्यु है। इस प्रकार भीष्म द्वारा रक्षित हमलोगों की सेना सब प्रकार से अजेय है। जब तक भ्रम है, तभी तक अविद्या का भी अस्तित्व है। भ्रम शान्त हुआ तो अविद्या भी समाप्त हो जाती है। भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की सेना जीतने में सुगम है। भावरूपी भीम। 'भावे विद्यते देव:'- भाव में वह क्षमता है कि अविदित परमात्मा भी विदित हो जाता है। 'भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।' (रामचरितमानस, ७/९२ख) श्रीकृष्ण ने इसे श्रद्धा कहकर सम्बोधित किया है। भाव में वह क्षमता है कि भगवान को भी वश में कर लेता है। भाव से ही सम्पूर्ण पुण्यमयी प्रवृत्तियों का विकास है। यह पुण्य का संरक्षक है। है तो इतना बलवान् कि परमदेव परमात्मा को संभव बनाता है; किन्तु साथ ही इतना कोमल भी है कि आज भाव है तो कल अभाव में बदलते देर नहीं लगती। आज आप कहते हैं कि महाराज बहुत अच्छे हैं, कल कह सकते हैं कि नहीं, हमने तो देखा महाराज खीर खाते हैं। घास पात जो खात हैं, तिनहि सतावे काम। दूध मलाई खात जे, तिनकी जाने राम।। इष्ट में लेशमात्र भी त्रुटि प्रतीत होने पर भाव डगमगा जाता है, पुण्यमयी प्रवृत्तियाँ विचलित हो उठती हैं, इष्ट से सम्बन्ध टूट जाता है। इसलिये भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की सेना जीतने में सुगम है। महर्षि पतंजलि का भी यही निर्णय है- 'स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः।'