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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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१८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च। त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।।३३।। हमें जिनके लिये राज्य, भोग और सुखादिक इच्छित हैं, वे ही परिवार जीवन की आशा त्यागकर युद्ध के मैदान में खड़े हैं। हमें राज्य इच्छित था तो परिवार को लेकर; भोग, सुख और धन की पिपासा थी तो स्वजन और परिवार के साथ उन्हें भोगने की थी। किन्तु जब सब-के-सब प्राणों की आशा त्यागकर खड़े हैं तो मुझे सुख, राज्य या भोग नहीं चाहिये। यह सब इन्हीं के लिये प्रिय थे। इनसे अलग होने पर हमें इनकी आवश्यकता नहीं है। जब तक परिवार रहेगा, तभी तक ये वासनाएँ भी रहती हैं। झोपड़ी में रहनेवाला भी अपने परिवार, मित्र और स्वजन को मारकर विश्व का साम्राज्य स्वीकार नहीं करेगा। अर्जुन भी यही कहता है कि हमें भोग प्रिय थे, विजय प्रिय थी; किन्तु जिनके लिये थी, जब वे ही नहीं रहेंगे तो भोगों से क्या प्रयोजन? इस युद्ध में मारना किसे है?- आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा।।३४।। इस युद्ध में आचार्य, ताऊ- चाचे, लड़के और इसी प्रकार दादा, मामा, श्वसुर, पोते, साले तथा समस्त सम्बन्धी ही हैं। एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन। अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते।।३५।। हे मधुसूदन ! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिये भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये कहना ही क्या है? अठारह अक्षौहिणी सेना में अर्जुन को अपना परिवार ही दिखायी पड़ा। इतने अधिक स्वजन वास्तव में क्या हैं? वस्तुतः अनुराग ही अर्जुन है। भजन के आरम्भ में प्रत्येक अनुरागी के समक्ष यही समस्या रहती है। सभी चाहते हैं कि वे भजन करें, उस परमसत्य को पा लें; किन्तु किसी अनुभवी सद्गुरु के संरक्षण में कोई अनुरागी जब क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संघर्ष को समझता है कि उसे किनसे लड़ना है, तो वह हताश हो जाता है। वह चाहता है कि उसके पिता का परिवार, ससुराल का परिवार, मामा का परिवार, सुहृद्, मित्र और गुरुजन साथ

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