यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
Page 59 of 429
Read in context२४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता रूढ़ियों में अपना बचाव ढूँढ़ने लगता है, जैसा अर्जुन ने किया। उसने कहा- 'कुलधर्म ही सनातन-धर्म है। इस युद्ध से सनातन-धर्म नष्ट हो जायेगा, कुल की स्त्रियाँ दूषित होंगी, वर्णसंकर पैदा होगा, जो कुल और कुलघातियों को अनन्तकाल तक नरक में ले जाने के लिये ही होता है।' अर्जुन अपनी समझ से सनातन-धर्म की रक्षा के लिये विकल है। उसने श्रीकृष्ण से अनुरोध किया कि हमलोग समझदार होकर भी यह महान् पाप क्यों करें? अर्थात् श्रीकृष्ण भी पाप करने जा रहे हैं। अन्ततोगत्वा पाप से बचने के लिये 'मैं युद्ध नहीं करूँगा'- ऐसा कहता हुआ हताश अर्जुन रथ के पिछले भाग में बैठ गया। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संघर्ष से पीछे हट गया। टीकाकारों ने इस अध्याय को 'अर्जुन-विषाद योग' कहा है। अर्जुन अनुराग का प्रतीक है। सनातन-धर्म के लिये विकल होनेवाले अनुरागी का विषाद योग का कारण बनता है। यही विषाद मनु को हुआ था- 'हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।' (रामचरितमानस, १/१४२) संशय में पड़कर ही मनुष्य विषाद करता है। उसे सन्देह था कि वर्णसंकर पैदा होगा, जो नरक में ले जायेगा। सनातन-धर्म के नष्ट होने का भी उसे विषाद था। अतः 'संशय-विषाद योग' का सामान्य नामकरण इस अध्याय के लिये उपयुक्त है। अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे 'संशयविषादयोगो' नाम प्रथमोऽध्यायः ।।१।। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में 'संशय-विषाद योग' नामक प्रथम अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'संशयविषादयोगो' नाम प्रथमोऽध्यायः ।।१।। इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत 'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'संशय-विषाद योग' नामक पहला अध्याय पूर्ण होता है। ।। हरिः ॐ तत्सत् ।।