यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context२८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता त्याग करो। यह हृदय की दुर्बलता मात्र है। इस पर अर्जुन ने तीसरा प्रश्न प्रस्तुत किया- अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।४।। अहंकार का शमन करनेवाले मधुसूदन! मैं रणभूमि में पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण से किस प्रकार बाणों से युद्ध करूँगा? क्योंकि अरिसूदन ! वे दोनों ही पूजनीय हैं। द्वैत ही द्रोण है। प्रभु अलग हैं, हम अलग हैं-द्वैत का यह भान ही प्राप्ति की प्रेरणा का आरम्भिक स्रोत है। यही द्रोणाचार्य का गुरुत्व है। भ्रम ही भीष्म है। जब तक भ्रम है तभी तक बच्चे, परिवार, रिश्तेदार सभी अपने लगते हैं। अपना लगने में भ्रम ही माध्यम है। आत्मा इन्हीं को पूज्य मानकर इनके साथ रहता है कि यह पिता हैं, दादा हैं, कुलगुरु हैं इत्यादि। साधन के पूर्तिकाल में 'गुरु न चेला, पुरुष अकेला।' न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः। चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।। ( आत्मषट्क, ५ ) जब चित्त उस परम आनन्द में विलीन हो जाता है, तब न गुरु ज्ञानदाता और न शिष्य ग्रहणकर्त्ता ही रह जाता है। यही परम की स्थिति है। गुरु का गुरुत्व प्राप्त कर लेने पर गुरुत्व एक-जैसा हो जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, “अर्जुन ! तू मुझमें निवास करेगा।” जैसे श्रीकृष्ण वैसा ही अर्जुन, और ठीक वैसा ही प्राप्तिवाला महापुरुष हो जाता है। ऐसी अवस्था में गुरु का भी विलय हो जाता है, गुरुत्व हृदय में प्रवाहित हो जाता है। अर्जुन गुरु-पद की ढाल बनाकर इस संघर्ष में प्रवृत्त होने से कतराना चाहता है। वह कहता है- गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्धिरप्रदिग्धान्।।५।।