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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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द्वितीय अध्याय ४७ प्रायः लोग इस श्लोक के अर्थ में समझते हैं कि इस युद्ध में मरोगे तो स्वर्ग जाओगे और जीतोगे तो पृथ्वी का भोग भोगोगे; किन्तु आपको स्मरण होगा, अर्जुन कह चुका है- “भगवन्! पृथ्वी ही नहीं अपितु त्रैलोक्य के साम्राज्य और देवताओं के स्वामीपन अर्थात् इन्द्रपद प्राप्त होने पर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता, जो इन्द्रियों को सुखानेवाले मेरे शोक को दूर कर सके। यदि इतना ही मिलना है, तो गोविन्द! मैं युद्ध कदापि नहीं करूँगा।” यदि इतने पर भी श्रीकृष्ण कहते कि- अर्जुन! लड़ो। जीतोगे तो पृथ्वी पा जाओगे, हारोगे तो स्वर्ग के नागरिक बन जाओगे, तो श्रीकृष्ण देते ही क्या हैं? अर्जुन इससे आगे का सत्य, श्रेय (परमकल्याण) की कामनावाला शिष्य था, जिसे सद्गुरुदेव श्रीकृष्ण ने बताया कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के इस संघर्ष में यदि शरीर का समय पूरा हो जाता है और लक्ष्य तक नहीं पहुँच सके तो स्वर्ग प्राप्त करोगे अर्थात् स्वर में ही विचरण करने की क्षमता प्राप्त कर लोगे, दैवी सम्पद् हृदय में ढल जायेगी और इस शरीर के रहते-रहते संघर्ष में सफल हो जाते हो तो ‘महीम्’- सबसे महान् ब्रह्म की महिमा का उपभोग करोगे, महामहिम की स्थिति प्राप्त कर लोगे। जीतोगे तो सर्वस्व; क्योंकि महामहिमत्व को पाओगे और हारोगे तो देवत्व- दोनों हाथों में लड्डू रहेंगे। लाभ में भी लाभ और हानि में भी लाभ ही है। पुनः इसी पर बल देते हैं- सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।३८।। इस प्रकार सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान समझकर तू युद्ध के लिये तैयार हो। युद्ध करने से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा। अर्थात् सुख में सर्वस्व और दुःख में भी देवत्व है। लाभ में महीम् की स्थिति अर्थात् सर्वस्व और हानि में देवत्व है। जय में महामहिम स्थिति और पराजय में भी दैवी सम्पद् पर अधिकार है। इस प्रकार अपने लाभ-हानि को भली प्रकार स्वयं समझकर तू युद्ध के लिये तैयार हो। लड़ने में ही दोनों वस्तुएँ हैं। लड़ोगे तो पाप अर्थात् आवागमन को प्राप्त नहीं होओगे। अतः तू युद्ध के लिये तैयार हो।

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