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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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५६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जन्म-मृत्यु से मुक्ति, निर्मल अविनाशी पद की प्राप्ति। बस ये दो ही योगक्रिया हैं। इसके अतिरिक्त बुद्धि अविवेकजन्य है, अनन्त शाखाओंवाली है, जिसका फल कर्मभोग के लिये बारम्बार जन्म-मृत्यु है। अर्जुन की दृष्टि त्रिलोकी के साम्राज्य तथा देवताओं के स्वामीपन तक ही सीमित थी। इतने तक के लिये भी वह युद्ध में प्रवृत्त नहीं हो रहा था। यहाँ श्रीकृष्ण उसे नवीन तथ्य उद्घाटित करते हैं कि आसक्तिरहित कर्म द्वारा अनामय पद प्राप्त होता है। निष्काम कर्मयोग परमपद को दिलाता है, जहाँ मृत्यु का प्रवेश नहीं है। इस कर्म में प्रवृत्ति कब होगी?- यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।५२।। जिस काल में तेरी (प्रत्येक साधक की) बुद्धि मोहरूपी दलदल को पूर्णतः पार कर लेगी, लेशमात्र भी मोह न रह जाय- न पुत्र में, न धन में, न प्रतिष्ठा में- इन सबसे लगाव टूट जायेगा, उस समय जो सुनने योग्य है उसे तू सुन सकेगा और सुने हुए के अनुसार वैराग्य को प्राप्त हो सकेगा अर्थात् उसे आचरण में ढाल सकेगा। अभी तो जो सुनने लायक है, उसे न तो तू सुन पाया है और आचरण का तो प्रश्न ही नहीं खड़ा होता। इसी योग्यता पर पुनः प्रकाश डालते हैं- श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।५३।। अनेक प्रकार के वेदवाक्यों को सुनकर विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मस्वरूप में समाधिस्थ होकर अचल-स्थिर ठहर जायेगी, तब तू समत्व योग को प्राप्त होगा। पूर्ण सम स्थिति को प्राप्त करेगा, जिसे 'अनामय परमपद' कहते हैं। यही योग की पराकाष्ठा है और यही अप्राप्य की प्राप्ति है। वेदों से तो शिक्षा ही मिलती है; किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं, 'श्रुतिविप्रतिपन्ना'- श्रुतियों के अनेक सिद्धान्तों को सुनने से बुद्धि विचलित हो जाती है। सिद्धान्त तो अनेकों सुने, लेकिन जो सुनने योग्य है लोग उससे दूर ही रहते हैं।

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