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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages
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१५४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जायेगा और प्रकृति भी उस ब्रह्म के ही अन्तर्गत है, प्रकृति में विचरण करना ब्रह्म के बाहर नहीं है; किन्तु श्रीकृष्ण के अनुसार यह गलत है। गीता में इन मान्यताओं का किंचित् भी स्थान नहीं है। श्रीकृष्ण का कथन है कि मन जहाँ- जहाँ जाय, जिन माध्यमों से जाय, उन्हीं माध्यमों से रोककर परमात्मा में ही लगावें। मन का निरोध सम्भव है। इस निरोध का परिणाम क्या होगा?- प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्। उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्।।२७।। जिसका मन पूर्णरूपेण शान्त है, जो पाप से रहित है, जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे ब्रह्म से एकीभूत योगी को सर्वोत्तम आनन्द प्राप्त होता है, जिससे उत्तम कुछ भी नहीं है। इसी पर पुनः बल देते हैं- युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः। सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।२८।। पापरहित योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर उस परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति के अनन्त आनन्द की अनुभूति करता है। वह 'ब्रह्मसंस्पर्श' अर्थात् ब्रह्म के स्पर्श और प्रवेश के साथ अनन्त आनन्द का अनुभव करता है। अतः भजन अनिवार्य है। इसी पर आगे कहते हैं- सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।२९।। योग के परिणाम से युक्त आत्मावाला, सबमें समभाव से देखनेवाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण प्राणियों में व्याप्त देखता है और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में ही प्रवाहित देखता है। इस प्रकार देखने से लाभ क्या है?- यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।३०।। जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में मुझ परमात्मा को देखता है, व्याप्त देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ परमात्मा के ही अन्तर्गत देखता है, उसके लिये मैं

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षष्ठम अध्याय १५५ अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। यह प्रेरक का आमने-सामने मिलन है, सख्यभाव है, सामीप्य मुक्ति है। सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।।३१।। जो पुरुष अनेकता से परे उपर्युक्त एकत्व भाव से मुझ परमात्मा को भजता है, वह योगी सब प्रकार के कार्यों में बरतता हुआ भी मेरे में ही बरतता है; क्योंकि मुझे छोड़कर उसके लिये कोई बचा भी तो नहीं। उसका तो सब मिट गया, इसलिये वह अब उठता, बैठता जो कुछ भी करता है, मेरे संकल्प से करता है। आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः।।३२।। हे अर्जुन! जो योगी अपने ही समान सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है, अपने-जैसा देखता है, सुख और दुःख भी सबमें समान देखता है, वह योगी (जिसका भेदभाव समाप्त हो गया है) परमश्रेष्ठ माना गया है। प्रश्न पूरा हुआ। इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया- अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्।।३३।। हे मधुसूदन! यह योग जो आप पहले बता आये हैं, जिससे समत्व भावदृष्टि मिलती है, मन के चञ्चल होने से बहुत समय तक इसमें ठहरनेवाली स्थिति में मैं अपने को नहीं देखता। चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।३४।। हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल है, प्रमथन स्वभाववाला है (प्रमथन अर्थात् दूसरे को मथ डालनेवाला), हठी तथा बलवान् है, इसलिये इसे वश में करना मैं वायु की भाँति अतिदुष्कर मानता हूँ। तूफानी हवा और इसको रोकना बराबर है। इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-

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१५६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता श्रीभगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।३५।। महान् कार्य करने के लिये प्रयत्नशील अर्थात् महाबाहु अर्जुन ! निःसन्देह मन चंचल है, बड़ी कठिनाई से वश में होनेवाला है; परन्तु कौन्तेय! यह अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में होता है। जहाँ चित्त को लगाना है, वहाँ स्थिर करने के लिये बार-बार प्रयत्न का नाम अभ्यास है तथा देखी-सुनी विषय-वस्तुओं में (संसार या स्वर्गादि भोगों में) राग अर्थात् लगाव का त्याग वैराग्य है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन को वश में करना कठिन है, किन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में हो जाता है। असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः।।३६।। अर्जुन! मन को वश में न करनेवाले पुरुष के लिये योग प्राप्त होना कठिन है; किन्तु स्ववश मनवाले प्रयत्नशील पुरुष के लिये योग सहज है, ऐसा मेरा अपना मत है। जितना कठिन तू मान बैठा है, उतना कठिन नहीं है। अतः इसे कठिन मानकर छोड़ मत दो। प्रयत्नपूर्वक लगकर योग को प्राप्त कर; क्योंकि मन वश में करने पर ही योग सम्भव है। इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया- अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।३७।। हे श्रीकृष्ण! योग करते-करते यदि किसी का मन चलायमान हो जाय, यद्यपि अभी योग में उसकी श्रद्धा है ही, तो ऐसा पुरुष भगवत्सिद्धि को प्राप्त न होकर किस गति को पाता है? कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति। अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि।।३८।। महाबाहु श्रीकृष्ण ! भगवत्प्राप्ति के मार्ग से विचलित हुआ वह मोहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादल की भाँति दोनों ओर से नष्ट-भ्रष्ट तो नहीं हो जाता?

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षष्ठम अध्याय १५७ छोटी-सी बदली आकाश में छाये, तो वह न बरस पाती है न लौटकर मेघों से ही मिल पाती है; बल्कि हवा के झोंकों से देखते-देखते नष्टप्राय हो जाती है। इसी प्रकार शिथिल प्रयत्नवाला, कुछ काल तक साधन करके स्थगित करनेवाला नष्ट तो नहीं हो जाता? वह न आपमें प्रवेश कर सका और न भोग ही भोग पाया। उसकी कौन-सी गति होती है? एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः। त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥३९॥ हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशय को सम्पूर्णता से मिटाने के लिये आप ही सक्षम हैं। आपके अतिरिक्त दूसरा कोई इस संशय को मिटानेवाला मिलना सम्भव नहीं है। इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- श्रीभगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥४०॥ पार्थिव शरीर को ही रथ बनाकर लक्ष्य की ओर अग्रसर अर्जुन! उस पुरुष का न तो इस लोक में और न परलोक में ही नाश होता है; क्योंकि हे तात! उस परमकल्याणकारी नियत कर्म को करनेवाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। उसका होता क्या है?- प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः। शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥४१॥ मन चलायमान होने से योगभ्रष्ट हुआ वह पुरुष पुण्यवानों के लोकों में वासनाओं को भोगकर (जिन वासनाओं को लेकर वह योगभ्रष्ट हुआ था, भगवान उसे थोड़े में सब दिखा-सुना देते हैं, उन्हें भोगकर) वह ‘शुचीनां श्रीमताम्’- शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है। (जो शुद्ध आचरणवाले हैं, वही श्रीमान् हैं।) अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्। एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥४२॥

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१५८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता अथवा वहाँ जन्म न मिलने पर भी स्थिरबुद्धि योगियों के कुल में वह प्रवेश पा जाता है। श्रीमानों के घर में पवित्र संस्कार बचपन से ही मिलने लगते हैं; किन्तु वहाँ जन्म न हो पाने पर वह योगियों के कुल में (घर में नहीं) शिष्य-परम्परा में प्रवेश पा जाता है। कबीर, तुलसी, रैदास, बाल्मीकि इत्यादि को शुद्ध आचरण और श्रीमानों का घर नहीं, योगियों के कुल में प्रवेश मिला। सद्गुरु के कुल में संस्कारों का परिवर्तन भी एक जन्म है और ऐसा जन्म संसार में निःसन्देह अतिदुर्लभ है। योगियों के यहाँ जन्म का अर्थ उनके शरीर से पुत्ररूप में उत्पन्न होना नहीं है। गृहत्याग से पूर्व पैदा होनेवाले लड़के मोहवश महापुरुष को भी भले ही पिता मानते रहे; किन्तु महापुरुष के लिये घरवालों के नाम पर कोई नहीं होता। जो शिष्य उनकी मर्यादाओं का अनुष्ठान करते हैं, उनका महत्त्व लड़कों से कई गुना अधिक मानते हैं। वही उनके सच्चे पुत्र हैं। जो योग के संस्कारों से युक्त नहीं हैं, उन्हें महापुरुष नहीं अपनाते। ‘पूज्य महाराज जी’ यदि साधु बनाते तो हजारों विरक्त उनके शिष्य होते। किन्तु उन्होंने किसी को किराया-भाड़ा देकर, किसी के घर सूचना भेजकर, पत्र भेजकर, समझा-बुझाकर सबको उनके घर लौटा दिया। बहुत लोग हठ करने लगे तो उन्हें अपशकुन हो। भीतर से मना हो कि इसमें साधु बनने का एक भी लक्षण नहीं है। इसे रखने में भलाई नहीं है, यह पार नहीं होगा। निराश होकर दो-एक ने पहाड़ से गिरकर अपनी जान भी दे दी; किन्तु महाराज जी ने उन्हें अपने यहाँ नहीं रखा। बाद में पता चलने पर बोले- “जानत रहेउँ कि बड़ा विकल है लेकिन ई सोचते कि सचहूँ के मरि जाई तो रखी लेते। एक ठो पतितै रहत, अउर का होत।” ममत्व उनमें भी विकट था, फिर भी नहीं रखा। छः- सात को, जिनके लिये आदेश हुआ कि- “आज एक योगभ्रष्ट आ रहा है, जन्म-जन्म से भटका हुआ चला आ रहा है, इस नाम और इस रूप का कोई आनेवाला है, उसे रखो, ब्रह्मविद्या का उपदेश करो, उसे आगे बढ़ाओ।” केवल उन्हीं को रखा। तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्। यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।।४३।।

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षष्ठम अध्याय १५९ वहाँ वह पूर्वशरीर में साधन किये हुए बुद्धि के संयोग को अर्थात् पूर्वजन्म के साधन-संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन ! उसके प्रभाव से वह फिर 'संसिद्धौ'- भगवत्प्राप्तिरूपी परमसिद्धि के निमित्त प्रयत्न करने लगता है। पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥४४॥ श्रीमानों के घर विषयों के वश में रहने पर भी वह पूर्वजन्म के अभ्यास से भगवत्पथ की ओर आकर्षित हो जाता है और योग में शिथिल प्रयत्नवाला वह जिज्ञासु भी वाणी के विषय को पार करके निर्वाण पद को पा जाता है। उसकी प्राप्ति का यही तरीका है। कोई एक जन्म में पाता भी नहीं। प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥४५॥ अनेक जन्मों से प्रयत्न करनेवाला योगी परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी सभी पापों से अच्छी प्रकार शुद्ध होकर परमगति को प्राप्त हो जाता है। प्राप्ति का यही क्रम है। पहले शिथिल प्रयत्न से वह योग आरम्भ करता है, मन चलायमान होने पर जन्म लेता है, सद्गुरु के कुल में प्रवेश पाता है और प्रत्येक जन्म में अभ्यास करते हुए वहीं पहुँच जाता है, जिसका नाम परमगति परमधाम है। श्रीकृष्ण ने कहा कि 'स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य' ( २/४० )- इस धर्म का स्वल्प अभ्यास भी महान जन्म-मृत्यु के भय से उद्धार करनेवाला होता है। धर्म बदलता नहीं है। इस योग में बीज का नाश नहीं होता। आप दो कदम चल भर दें, उस साधन का कभी नाश नहीं होता। हर परिस्थिति में रहते हुए पुरुष ऐसा कर सकता है। कारण कि थोड़ा साधन तो परिस्थितियों से घिरनेवाला व्यक्ति ही कर पाता है; क्योंकि उसके पास समय नहीं है। आप काले हों, गोरे हों अथवा कहीं के हों, गीता सबके लिये है। आपके लिये भी है, बशर्ते आप मनुष्य हों। उत्कट प्रयत्नवाला चाहे जो हो, किन्तु शिथिल प्रयत्नवाला गृहस्थ ही होता है। गीता गृहस्थ-विरक्त, शिक्षित-अशिक्षित, सर्वसाधारण मनुष्य मात्र के लिये है।

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१६० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता किसी ‘साधु’ नामक विचित्र प्राणी के लिये ही हो, ऐसा नहीं। अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण निर्णय देते हैं- तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥४६॥ तपस्वियों से योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है, कर्मियों से भी योगी श्रेष्ठ है; इसलिये अर्जुन ! तू योगी बन। तपस्वी- तपस्वी मनसहित इन्द्रियों को उस योग में ढालने के लिये तपाता है, अभी योग उसमें ढला नहीं। कर्मी- कर्मी इस नियत कर्म को जानकर उसमें प्रवृत्त होता है। न तो वह अपनी शक्ति समझकर ही प्रवृत्त है और न वह समर्पण करके ही प्रवृत्त है, करता भर है। ज्ञानी- ज्ञानमार्गी उसी नियत कर्म यज्ञ की प्रक्रिया-विशेष को भली प्रकार समझते हुए अपनी शक्ति को सामने रखकर उसमें प्रवृत्त होता है। उसके लाभ-हानि की जिम्मेदारी उसी पर है। उस पर दृष्टि रखकर चलता है। योगी- निष्काम कर्मयोगी इष्ट पर निर्भर होकर पूरे समर्पण के साथ उसी नियत कर्म ‘योग-साधना’ में प्रवृत्त होता है, जिसके योगक्षेम की जिम्मेदारी भगवान् अर्थात् योगेश्वर वहन करते हैं। पतन की परिस्थितियाँ होते हुए भी उसके लिये पतन का भय नहीं है; क्योंकि जिस परमतत्त्व को चाहता है, वही उसे सँभालने की जिम्मेदारी भी ले लेता है। तपस्वी अभी योग को ढालने में प्रयत्नशील है। कर्मी केवल कर्म जानकर करता भर है। ये गिर भी सकते हैं; क्योंकि इन दोनों में न समर्पण है और न अपनी हानि-लाभ देखने की क्षमता; किन्तु ज्ञानी योग की परिस्थितियों को जानता है, अपनी शक्ति समझता है, उसकी जिम्मेदारी उसी पर है और निष्काम कर्मयोगी तो इष्ट के ऊपर अपने को फेंक चुका है, वह इष्ट सँभालेगा। परमकल्याण के पथ पर ये दोनों ठीक चलते हैं; किन्तु जिसका भार वह इष्ट सँभालता है, वह इन सबसे श्रेष्ठ है; क्योंकि प्रभु ने उसे ग्रहण कर लिया है। उसका हानि-लाभ वह प्रभु देखता है। इसलिये योगी श्रेष्ठ है। अतः अर्जुन ! तू योगी बन। समर्पण के साथ योग का आचरण कर।

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षष्ठम अध्याय १६१ योगी श्रेष्ठ है; किन्तु उनसे भी वह योगी सर्वश्रेष्ठ है, जो अन्तरात्मा से लगता है। इसी पर कहते हैं- योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥४७॥ सम्पूर्ण निष्काम कर्मयोगियों में भी जो श्रद्धाविभोर होकर अन्तरात्मा से, अन्तर्चिन्तन से मुझे निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परमश्रेष्ठ मान्य है। भजन दिखावे या प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। इससे समाज भले ही अनुकूल हो किन्तु प्रभु प्रतिकूल हो जाते हैं। भजन अत्यन्त गोपनीय है और वह अन्तःकरण से होता है। उसका उतार-चढ़ाव अन्तःकरण के ऊपर है। निष्कर्ष- इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि फल के आश्रय से रहित होकर जो 'कार्यम् कर्म' अर्थात् करने योग्य प्रक्रिया-विशेष का आचरण करता है, वही संन्यासी है और उसी कर्म को करनेवाला ही योगी है। केवल क्रियाओं अथवा अग्नि को त्यागनेवाला योगी अथवा संन्यासी नहीं होता। संकल्पों का त्याग किये बिना कोई भी पुरुष संन्यासी अथवा योगी नहीं होता। हम संकल्प नहीं करते- ऐसा कह देने मात्र से संकल्प पिण्ड नहीं छोड़ते। योग में आरूढ़ होने की इच्छावाले पुरुष को चाहिये कि 'कार्यम् कर्म' करे। कर्म करते-करते योगारूढ़ हो जाने पर ही सर्वसंकल्पों का अभाव होता है, इससे पूर्व नहीं। सर्वसंकल्पों का अभाव ही संन्यास है। योगेश्वर ने पुनः बताया कि आत्मा अधोगति में जाता है और उसका उद्धार भी होता है। जिस पुरुष द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ जीत ली गयी हैं, उसका आत्मा उसके लिये मित्र बनकर मित्रता में बरतता है तथा परमकल्याण करनेवाला होता है। जिसके द्वारा ये नहीं जीती गयीं, उसके लिये उसी का आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतता है, यातनाओं का कारण बनता है। अतः मनुष्य को चाहिये कि अपने आत्मा को अधोगति में न पहुँचावे, अपने द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार करे। उन्होंने प्राप्तिवाले योगी की रहनी बतायी। 'यज्ञस्थली', बैठने का आसन तथा बैठने के तरीके पर उन्होंने कहा कि स्थान एकान्त और स्वच्छ हो। वस्त्र,

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१६२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता मृगचर्म अथवा कुश की चटाई में से कोई एक आसन हो। कर्म के अनुरूप चेष्टा, युक्ताहार-विहार, सोने-जागने के संयम पर उन्होंने बल दिया। योगी के निरुद्ध चित्त की उपमा उन्होंने वायुरहित स्थान में दीपक की अकम्पित लौ से दी। और इस प्रकार उस निरुद्ध चित्त का भी जब विलय हो जाता है, उस समय वह योग की पराकाष्ठा अनन्त आनन्द को प्राप्त होता है। संसार के संयोग- वियोग से रहित अनन्त सुख का नाम योग है। योग का अर्थ है उससे मिलन। जो योगी इसमें प्रवेश पा जाता है, वह सम्पूर्ण भूतों में समदृष्टिवाला हो जाता है। जैसे अपनी आत्मा वैसे ही सबकी आत्मा को देखता है। वह परम पराकाष्ठा की शान्ति को प्राप्त होता है। अतः योग आवश्यक है। मन जहाँ-जहाँ जाय, वहाँ-वहाँ से घसीटकर बारम्बार इसका निरोध करना चाहिये। श्रीकृष्ण ने स्वीकार किया कि मन बड़ी कठिनाई से वश में होनेवाला है, लेकिन होता है। यह अभ्यास और वैराग्य द्वारा वश में हो जाता है। शिथिल प्रयत्नवाला व्यक्ति भी अनेक जन्म के अभ्यास से वहीं पहुँच जाता है, जिसका नाम परमगति अथवा परमधाम है। तपस्वियों, ज्ञानमार्गियों तथा केवल कर्मियों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिये अर्जुन ! तू योगी बन। समर्पण के साथ अन्तर्मन से योग का आचरण कर। प्रस्तुत अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने प्रमुख रूप से योग की प्राप्ति के लिये अभ्यास पर बल दिया है। अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ‘अभ्यासयोगो’ नाम षष्ठोऽध्यायः।।६।। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में ‘अभ्यास योग’ नामक छठाँ अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः ‘यथार्थगीता’ भाष्ये ‘अभ्यासयोगो’ नाम षष्ठोऽध्यायः।।६।। इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के भाष्य ‘यथार्थ गीता’ में ‘अभ्यासयोग’ नामक छठाँ अध्याय पूर्ण होता है। ।। हरिः ॐ तत्सत् ।।

सप्तमोऽध्यायः समग्र जानकारी

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।। ॐ श्री परमात्मने नमः।। ।। अथ सप्तमोऽध्यायः ।। गत अध्यायों में गीता के मुख्य-मुख्य प्रायः सभी प्रश्न पूर्ण हो गये हैं। निष्काम कर्मयोग, ज्ञानयोग, कर्म तथा यज्ञ का स्वरूप और उसकी विधि, योग का वास्तविक स्वरूप और उसका परिणाम तथा अवतार, वर्णसंकर, सनातन, आत्मस्थित महापुरुष के लिये भी लोकहितार्थ कर्म करने पर बल, युद्ध इत्यादि पर विशद चर्चा की गयी। अगले अध्यायों में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इन्हीं से सन्दर्भित अनेक पूरक प्रश्नों को लिया है, जिनका समाधान तथा अनुष्ठान आराधना में सहायक सिद्ध होगा। छठें अध्याय के अन्तिम श्लोक में योगेश्वर ने यह कहकर प्रश्न का स्वयं बीजारोपण कर दिया कि जो योगी 'मद्गतेनान्तरात्मना'- मुझमें अच्छी प्रकार स्थित अन्तःकरणवाला है, उसे मैं अतिशय श्रेष्ठ योगी मानता हूँ। परमात्मा में अच्छी प्रकार स्थिति क्या है? बहुत से योगी परमात्मा को प्राप्त तो होते हैं फिर भी कहीं कोई कमी उन्हें खटकती है। लेशमात्र भी कसर न रह जाय, ऐसी अवस्था कब आयेगी? सम्पूर्णता से परमात्मा की जानकारी कब आयेगी? कब होती है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।१।। पार्थ ! तू मुझमें आसक्त हुए मनवाला, बाहरी नहीं अपितु 'मदाश्रयः'- मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ (छोड़कर नहीं) मुझको जिस प्रकार संशयरहित जानेगा, उसको सुन। जिसे जानने के पश्चात् लेशमात्र भी संशय न रह जाय, विभूतियों की उस समग्र जानकारी पर पुनः बल देते हैं-

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१६४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥२॥ मैं तेरे लिये इस विज्ञानसहित ज्ञान को सम्पूर्णता से कहूँगा। पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी सृष्टि करता है, उस अमृत-तत्त्व की प्राप्ति के साथ मिलनेवाली जानकारी का नाम ज्ञान है। परमतत्त्व परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है। महापुरुष को एक साथ सर्वत्र कार्य करने की जो क्षमता मिलती है, वह विज्ञान है। कैसे वह प्रभु एक साथ सबके हृदय में कार्य करता है? किस प्रकार वह उठाता, बैठाता और प्रकृति के द्वन्द्व से निकालकर स्वरूप तक की दूरी तय करा लेता है? उसकी इस कार्य-प्रणाली का नाम विज्ञान है। इस विज्ञानसहित ज्ञान को सम्पूर्णता से कहूँगा, जिसे जानकर (सुनकर नहीं) संसार में और कुछ भी जानने योग्य नहीं रह जायेगा। जाननेवालों की संख्या बहुत कम है- मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥३॥ हजारों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य मेरी प्राप्ति के लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले योगियों में भी कोई विरला ही पुरुष मुझे तत्त्व (साक्षात्कार) के साथ जानता है। अब समग्र तत्त्व है कहाँ? एक स्थान पर पिण्डरूप में है अथवा सर्वत्र व्याप्त है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥४॥ अर्जुन! भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार- ऐसे यह आठ प्रकार के भेदोंवाली मेरी प्रकृति है। यह अष्टधा मूल प्रकृति है। अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥५॥

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सप्तम अध्याय १६५ 'इयम्' अर्थात् यह आठ प्रकारोंवाली तो मेरी अपरा प्रकृति है अर्थात् जड़ प्रकृति है। महाबाहु अर्जुन! इससे दूसरी को जीवरूप 'परा' अर्थात् चेतन प्रकृति जान, जिससे सम्पूर्ण जगत् धारण किया हुआ है। वह है जीवात्मा। जीवात्मा भी प्रकृति के सम्बन्ध में रहने के कारण प्रकृति ही है। एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा।।६।। अर्जुन! ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत 'एतद्योनीनि'- इन महाप्रकृतियों से, परा और अपरा प्रकृतियों से ही उत्पन्न होनेवाले हैं। यही दोनों एकमात्र योनि हैं। मैं सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति तथा प्रलय रूप हूँ अर्थात् मूल कारण हूँ। जगत् की उत्पत्ति मुझसे है और (प्रलय) विलय भी मुझमें है। जब तक प्रकृति विद्यमान है, तब तक मैं ही उसकी उत्पत्ति हूँ और जब कोई महापुरुष प्रकृति का पार पा लेता है, तब मैं ही महाप्रलय भी हूँ, जो अनुभव में आता है। सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय के प्रश्न को मानव समाज ने कौतूहल से देखा है। विश्व के अनेक शास्त्रों में इसे किसी-न-किसी तरह समझाने का प्रयास चला आ रहा है। कोई कहता है कि प्रलय में संसार डूब जाता है, तो किसी के अनुसार सूर्य इतना नीचे आ जाता है कि पृथ्वी जल जाती है। कोई इसी को कयामत कहता है कि इसी दिन सबका फैसला सुनाया जाता है, तो कोई नित्य प्रलय, नैमित्तिक प्रलय की गणना में व्यस्त है। किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार प्रकृति अनादि है। परिवर्तन होते रहे हैं, किन्तु यह नष्ट कभी नहीं हुई। भारतीय धर्मग्रन्थों के अनुसार मनु ने प्रलय देखा था। इसके साथ ग्यारह ऋषियों ने मत्स्य की सींग में नाव बाँधकर हिमालय के एक उत्तुंग शिखर की शरण ली थी। लीलाकार श्रीकृष्ण के उपदेशों एवं जीवन से सम्बन्धित उनके समकालीन शास्त्र भागवत में मृकण्डु मुनि के पुत्र मार्कण्डेय जी द्वारा प्रलय का आँखों देखा हाल प्रस्तुत है। वे हिमालय के उत्तर में पुष्पभद्रा नदी के किनारे रहते थे।

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१६६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता भागवत के द्वादश स्कन्ध के आठवें और नौवें अध्याय के अनुसार शौनकादि ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि मार्कण्डेय जी ने महाप्रलय में वट के पत्ते पर भगवान बालमुकुन्द के दर्शन किये थे; किन्तु वे तो हमारे ही वंश के थे, हमसे कुछ ही समय पूर्व हुए थे। उनके जन्म के बाद न कोई प्रलय हुआ और न सृष्टि ही डूबी। सब कुछ यथावत् है, तब उन्होंने कैसा प्रलय देखा? सूत जी ने बताया कि मार्कण्डेय जी की प्रार्थना से प्रसन्न होकर नर- नारायण ने उन्हें दर्शन दिया। मार्कण्डेय जी ने कहा कि मैं आपकी वह माया देखना चाहता हूँ, जिससे प्रेरित होकर यह आत्मा अनन्त योनियों में भ्रमण करता है। भगवान ने स्वीकार किया। एक दिन जब मुनि अपने आश्रम में भगवान के चिन्तन में तन्मय हो रहे थे, तब उन्हें दिखायी पड़ा कि चारों ओर से समुद्र उमड़कर उनके ऊपर आ रहा है। उसमें 'मगर' छलाँगे लगा रहे थे। उनकी चपेट में ऋषि मार्कण्डेय भी आ रहे थे। वे इधर-उधर बचने के लिये भाग रहे थे। आकाश, सूर्य, पृथ्वी, चन्द्रमा, स्वर्ग, ज्योतिर्मण्डल सभी उस समुद्र में डूब गये। इतने में मार्कण्डेय जी को बरगद का पेड़ और उसके पत्ते पर एक शिशु दिखायी दिया। श्वास के साथ मार्कण्डेय जी भी उस शिशु के उदर में चले गये और अपना आश्रम, सूर्यमण्डलसहित सृष्टि को जीवित पाया और पुनः श्वास के साथ उस शिशु के उदर से वे बाहर आ गये। नेत्र खुलने पर मार्कण्डेय जी ने अपने को उसी आश्रम में अपने ही आसन पर पाया। स्पष्ट है कि करोड़ों वर्ष के भजन के पश्चात् उन मुनि ने ईश्वरीय दृश्य को अपने हृदय में देखा, अनुभव में देखा। बाहर सब कुछ ज्यों-का-त्यों था। अतः प्रलय योगी के हृदय में ईश्वर से मिलनेवाली अनुभूति है। भजन के पूर्तिकाल में योगी के हृदय में संसार का प्रवाह मिटकर अव्यक्त परमात्मा ही शेष बचता है, यही प्रलय है। बाहर प्रलय नहीं होता। महाप्रलय शरीर रहते ही अद्वैत की अनिर्वचनीय स्थिति है। यह क्रियात्मक है। केवल बुद्धि से निर्णय लेनेवाले भ्रम का ही सृजन करते हैं, चाहे हम हों या आप। इसी पर आगे देखें-

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सप्तम अध्याय १६७ मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।७।। धनंजय! मेरे सिवाय किंचिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मेरे में गुँथा हुआ है। है तो; परन्तु जानेंगे कब? जब (इसी अध्याय के प्रथम श्लोक के अनुसार) अनन्य आसक्ति (भक्ति) से मेरे परायण होकर योग में उसी रूप से लग जाएँ। इसके बिना नहीं। योग में लगना आवश्यक है। रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु।।८।। कौन्तेय! जल में मैं रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ- (ओ+अहं+कार) स्वयं का आकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ। तथा मैं- पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।।९।। पृथिवी में पवित्र गन्ध और अग्नि में तेज हूँ। सम्पूर्ण जीवों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में उनका तप हूँ। बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।।१०।। पार्थ! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन कारण अर्थात् बीज मुझे ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ। इसी क्रम में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।।११।। हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! मैं बलवानों की कामना और आसक्तिरहित बल हूँ। संसार में सब बलवान् ही तो बनते हैं। कोई दण्ड-बैठक लगाता है, तो कोई परमाणु इकट्ठा करता है; किन्तु नहीं, श्रीकृष्ण कहते हैं- काम और राग से

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१६८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता परे जो बल है वह मैं हूँ। वही वास्तविक बल है। सब भूतों में धर्म के अनुकूल कामना मैं हूँ। परब्रह्म परमात्मा ही एकमात्र धर्म है, जो सबको धारण किये हुए है। जो शाश्वत आत्मा है वही धर्म है। जो उससे अविरोध रखनेवाली कामना है, मैं हूँ। आगे भी श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन ! मेरी प्राप्ति के लिये इच्छा कर। सब कामनाएँ तो वर्जित हैं; किन्तु उस परमात्मा को पाने की कामना आवश्यक है अन्यथा आप साधन कर्म में प्रवृत्त नहीं होंगे। ऐसी कामना भी मेरी ही देन है। ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि।।१२।। और भी जो सत्त्वगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, जो रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, उन सबको तू मुझसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं, ऐसा जान। परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मेरे में नहीं हैं। क्योंकि न मैं उनमें खोया हुआ हूँ और न वे ही मुझमें प्रवेश कर पाते हैं; क्योंकि मुझे कर्म से स्पृहा नहीं है। मैं निर्लेप हूँ, मुझे इनमें कुछ पाना नहीं है। इसलिये मुझमें प्रवेश नहीं कर पाते। ऐसा होने पर भी- जिस प्रकार आत्मा की उपस्थिति से ही शरीर को भूख-प्यास लगती है, आत्मा को अन्न अथवा जल से कोई प्रयोजन नहीं है, उसी प्रकार प्रकृति परमात्मा की उपस्थिति में ही अपना कार्य कर पाती है। परमात्मा उसके गुण और कार्यों से निर्लेप रहता है। त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्। मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्।।१३।। सात्त्विक, राजस और तामस इन तीन गुणों के कार्यरूप भावों से यह सारा जगत् मोहित हो रहा है इसलिये लोग इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को तत्त्व से भली प्रकार नहीं जानते। मैं इन तीनों गुणों से परे हूँ अर्थात् जब तक अंशमात्र भी गुणों का आवरण विद्यमान है, तब तक कोई मुझे नहीं जानता। उसे अभी चलना है, वह राही है और- दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।१४।।

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सप्तम अध्याय १६९ यह त्रिगुणमयी मेरी अद्भुत माया दुस्तर है; किन्तु जो पुरुष मुझे ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया का पार पा जाते हैं। यह माया है तो दैवी, परन्तु अगरबत्ती जलाकर इसकी पूजा न करने लगें। इससे पार पाना है। न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः।।१५।। जो मुझे निरन्तर भजते हैं, वे जानते हैं। फिर भी लोग नहीं भजते। माया के द्वारा जिनके ज्ञान का अपहरण कर लिया गया है, जो आसुरी स्वभाव को धारण किये हुए, मनुष्यों में अधम, काम-क्रोधादि दुष्कृतियों को करनेवाले मूढ़लोग मुझे नहीं भजते। तो भजता कौन है?- चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।१६।। हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! 'सुकृतिनः'- उत्तम अर्थात् नियत कर्म (जिसके परिणाम में श्रेय की प्राप्ति हो, उसको) करनेवाले 'अर्थार्थी' अर्थात् सकाम, 'आर्तः' अर्थात् दुःख से छूटने की इच्छावाले, 'जिज्ञासुः' अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से जानने की इच्छावाले और 'ज्ञानी' अर्थात् जो प्रवेश की स्थिति में हैं- ये चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते हैं। 'अर्थ' वह वस्तु है, जिससे हमारे शरीर अथवा सम्बन्धों की पूर्ति हो। इसलिये अर्थ, कामनाएँ सब कुछ पहले तो भगवान द्वारा पूर्ण होती हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही पूर्ण करता हूँ; किन्तु इतना ही वास्तविक 'अर्थ' नहीं है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है, यही अर्थ है। सांसारिक 'अर्थ' की पूर्ति करते-करते भगवान वास्तविक अर्थ आत्मिक सम्पत्ति की ओर बढ़ा देते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि इतने ही से मेरा भक्त सुखी नहीं होगा इसलिये वे आत्मिक सम्पत्ति भी उसे देने लगते हैं। 'लोक लाहु परलोक निबाहू।' ( रामचरितमानस, १/१९/२ )- लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह ये दोनों भगवान की वस्तुएँ हैं। अपने भक्त को खाली नहीं छोड़ते।

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१७० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता 'आर्त्त:'- जो दुःखी हो, 'जिज्ञासु:'- समग्रता से जानने की इच्छावाले जिज्ञासु मुझे भजते हैं। साधना की परिपक्व अवस्था में दिग्दर्शन (प्रत्यक्ष दर्शन) की अवस्थावाले ज्ञानी भी मुझे भजते हैं। इस प्रकार चार प्रकार के भक्त मुझे भजते हैं, जिनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है अर्थात् ज्ञानी भी भक्त ही है। इन सबमें भी- तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ।।१७।। अर्जुन! उनमें भी नित्य मुझमें एकीभाव में स्थित अनन्य भक्तिवाला ज्ञानी विशिष्ट है; क्योंकि साक्षात्कार के सहित जाननेवाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी भी मुझे अत्यन्त प्रिय है। वह ज्ञानी मेरा ही स्वरूप है। उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।।१८।। यद्यपि ये चारों प्रकार के भक्त उदार ही हैं (कौन-सी उदारता कर दी? क्या आपके भक्ति करने से भगवान को कुछ मिल जाता है? क्या भगवान में कोई कमी है जिसे आपने पूरा कर दिया? नहीं, वस्तुतः वही उदार है जो अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचाये, जो उसके उद्धार के लिये अग्रसर है। इस प्रकार यह सब उदार हैं।) परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है, ऐसी मेरी मान्यता है; क्योंकि वह स्थिरबुद्धि ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही स्थित है। अर्थात् वह मैं हूँ, वह मुझमें है। मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं है। इसी पर पुनः बल देते हैं- बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।१९।। अभ्यास करते-करते बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में, प्राप्तिवाले जन्म में साक्षात्कार को प्राप्त हुआ ज्ञानी 'सब कुछ वासुदेव ही है'- इस प्रकार मेरे को भजता है। वह महात्मा अतिदुर्लभ है। वह किसी वासुदेव की प्रतिमा नहीं गढ़वाता बल्कि अपने भीतर ही उस परमदेव का वास पाता है। उसी ज्ञानी महात्मा को श्रीकृष्ण तत्त्वदर्शी भी कहते हैं। इन्हीं महापुरुषों से बाहर समाज में

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सप्तम अध्याय १७१ कल्याण सम्भव है। इस प्रकार के प्रत्यक्ष तत्त्वदर्शी महापुरुष श्रीकृष्ण के शब्दों में अतिदुर्लभ हैं। जब श्रेय और प्रेय (मुक्ति और भोग) दोनों ही भगवान से मिलते हैं, तब तो सभी को एकमात्र भगवान का भजन करना चाहिये, फिर भी लोग उन्हें नहीं भजते। क्यों? श्रीकृष्ण के ही शब्दों में- कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया।।२०।। “वह तत्त्वदर्शी महात्मा अथवा परमात्मा ही सब कुछ है।”-लोग ऐसा समझ नहीं पाते; क्योंकि भोगों की कामनाओं द्वारा लोगों के विवेक का अपहरण कर लिया गया है, इसलिये वे अपनी प्रकृति अर्थात् जन्म-जन्मान्तरों से अर्जित संस्कारों के स्वभाव से प्रेरित होकर मुझ परमात्मा से भिन्न अन्य देवताओं और उनके लिये प्रचलित नियमों की शरण लेते हैं। यहाँ 'अन्य देवता' का प्रसंग पहली बार आया है। यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।।२१।। जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, मैं उसी देवता के प्रति उसकी श्रद्धा को स्थिर करता हूँ। मैं स्थिर करता हूँ; क्योंकि देवता नाम की कोई वस्तु होती तब तो वह देवता ही श्रद्धा को स्थिर करता। स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्।।२२।। वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देव-विग्रह के पूजन में तत्पर होता है और देवता के माध्यम से मेरे ही द्वारा निर्मित उन इच्छित भोगों को निःसन्देह प्राप्त होता है। भोग कौन देता है? मैं ही देता हूँ। उसकी श्रद्धा का परिणाम है भोग, न कि किसी देवता की देन। किन्तु वह फल तो पा ही लेता है फिर इसमें बुराई क्या है? इस पर कहते हैं-

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१७२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि।।२३।। परन्तु उन अल्पबुद्धिवालों का वह फल नाशवान् है। आज फल है तो भोगते-भोगते नष्ट हो जायेगा इसलिये नाशवान् है। देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं अर्थात् देवता भी नाशवान् हैं। देवताओं से लेकर यावन्मात्र जगत् परिवर्तनशील और मरणधर्मा है। मेरा भक्त मुझे ही प्राप्त होता है, जो अव्यक्त है 'नैष्ठिकीं परमशान्ति' पाता है। अध्याय तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस यज्ञ द्वारा तुमलोग देवताओं अर्थात् दैवी सम्पद् की उन्नति करो। ज्यों-ज्यों दैवी सम्पद् की उन्नति होगी, वही तुम्हारी उन्नति है। क्रमशः उन्नति करते-करते परमश्रेय को प्राप्त कर लो। यहाँ देवता उस दैवी सम्पद् का समूह है, जिससे परमदेव परमात्मा का देवत्व अर्जित किया जाता है। दैवी सम्पद् मोक्ष के लिये है, जिसके छब्बीस लक्षणों का निरूपण गीता के सोलहवें अध्याय में किया गया है। 'देवता' हृदय के अन्तराल में परमदेव परमात्मा के देवत्व को अर्जित करानेवाले सद्गुणों का नाम है। थी तो यह अन्दर की वस्तु; किन्तु कालान्तर में लोगों ने भीतर की वस्तु को बाहर देखना प्रारम्भ कर दिया। मूर्तियाँ गढ़ लीं, कर्मकाण्ड रच डाले और वास्तविकता से दूर खड़े हो गये। श्रीकृष्ण ने इस भ्रान्ति का निराकरण उपर्युक्त चार श्लोकों में किया। गीता में पहली बार 'अन्य देवताओं' का नाम लेते हुए उन्होंने कहा कि देवता होते ही नहीं। लोगों की श्रद्धा जहाँ झुकती है, वहाँ मैं ही खड़ा होकर उनकी श्रद्धा को पुष्ट करता हूँ और मैं ही वहाँ फल भी देता हूँ। वह फल भी नश्वर है। फल नष्ट हो जाते हैं, देवता नष्ट हो जाते हैं और देवताओं को पूजनेवाला भी नष्ट हो जाता है। जिनका विवेक नष्ट हो गया है, वे मूढ़बुद्धि ही अन्य देवताओं को पूजते हैं। श्रीकृष्ण तो यहाँ तक कहते हैं कि अन्य देवताओं को पूजने का विधान ही अयुक्तिसंगत है (आगे देखेंगे, अध्याय ९/२३)। अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।२४।।

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सप्तम अध्याय १७३ यद्यपि जब देवताओं के नाम पर देवता नाम की कोई वस्तु है ही नहीं, जो फल मिलता है वह भी नाशवान् है, फिर भी सब लोग मेरा भजन नहीं करते; क्योंकि बुद्धिहीन पुरुष (जैसा पिछले श्लोक में आया कि कामनाओं द्वारा जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है वे) मेरे सर्वोत्तम, अविनाशी और परमप्रभाव को भली प्रकार नहीं जानते, इसलिये वे मुझ अव्यक्त पुरुष को व्यक्तिभाव को प्राप्त हुआ मानते हैं, मनुष्य मानते हैं। अर्थात् श्रीकृष्ण भी मनुष्य शरीरधारी योगी थे, योगेश्वर थे। जो स्वयं योगी हों और दूसरों को भी योग प्रदान करने की जिनमें क्षमता हो, उन्हें योगेश्वर कहते हैं। साधना के सही दौर में पड़कर क्रमशः उत्थान होते-होते महापुरुष भी उसी परमभाव में स्थित हो जाते हैं। शरीरधारी होते हुए भी वे उसी अव्यक्त स्वरूप में स्थित हो जाते हैं; फिर भी कामनाओं से विवश मन्दबुद्धि के लोग उन्हें साधारण व्यक्ति ही मानते हैं। वे सोचते हैं कि हमारी ही तरह तो यह भी पैदा हुए हैं, भगवान कैसे हो सकते हैं? उन बेचारों का दोष भी क्या है? दृष्टिपात करते हैं तो शरीर ही दिखायी पड़ता है। वे महापुरुष के वास्तविक स्वरूप को देख क्यों नहीं पाते? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण से ही सुनें- नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥२५॥ सामान्य मनुष्य के लिये माया एक परदा है, जिसके द्वारा परमात्मा सर्वथा छिपा है। योग-साधना समझकर वह इसमें प्रवृत्त होता है। इसके पश्चात् योगमाया अर्थात् योगक्रिया भी एक आवरण ही है। योग का अनुष्ठान करते-करते उसकी पराकाष्ठा योगारूढ़ता आ जाने पर वह छिपा हुआ परमात्मा विदित होता है। योगेश्वर कहते हैं- मैं अपनी योगमाया से ढँका हुआ हूँ। केवल योग की परिपक्व अवस्थावाले ही मुझे यथार्थ देख सकते हैं। मैं सबके लिये प्रत्यक्ष नहीं हूँ इसलिये यह अज्ञानी मनुष्य मुझ जन्मरहित (जिसे अब जन्म नहीं लेना है), अविनाशी (जिसका नाश नहीं होना है), अव्यक्त स्वरूप (जिसे पुनः व्यक्त नहीं होना है) को नहीं जानता। अर्जुन भी श्रीकृष्ण को अपनी ही तरह मनुष्य मानता था। आगे उन्होंने दृष्टि दी तो अर्जुन गिड़गिड़ाने