योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
by आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य)
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Read in context( ४ ) सरेच-पूरैरनिलस्य कुम्भैः¹ सर्वासु नाडीसु विशोधितासु । अनाहतादम्बुरुहादुदेति स्वात्मावगम्यः स्वयमेव बोधः² ॥३॥ [ १. कुम्भे ( पाठ० )--यह अपपाठ है। २. अनाहताख्यो बहुभिः प्रकारैरन्तः प्रवर्तेत सदा निनादः ( पाठ० )—अनाहत नामक नाद अनेक प्रकारों से अन्तःकरण में सदा उदित रहता है । ] अनुवाद —वायु के पूरक, रेचक और कुम्भक के द्वारा जब नाडियाँ विशोधित मलहीन हो जाती हैं, तब अनाहत नामक पद्म (चक्र) से वह बोध स्वयं ही उदित होता है जो अपने द्वारा ही ज्ञेय है (अर्थात् दूसरे किसी के द्वारा ज्ञात नही हो सकता) । व्याख्या --यहाँ रेचक, पूरक और कुम्भक के द्वारा जिस नाडीशुद्धि की बात कही गई है उसका स्वरूप है —योगविरोधी मल का दूरीकरण जिसके कुछ बाह्य फल शरीर में भी दृष्ट होते हैं। नाडीशुद्धि होने पर सप्राण शरीर आत्मज्ञान के अभ्यास के लिए समर्थ होता है तथा सूक्ष्म मानस अनुभूतियों का उदय होने पर उसके वेग का धारण कर सकता है।¹ हठयोग के ग्रन्थों में प्राणायाम का विशेष विवरण द्रष्टव्य है। सामान्यतः कहा जा सकता है कि बाह्य वायु का प्रयत्नविशेष से ग्रहण करना पूरक है। पूरित वायु का बन्ध- पूर्वक निरोध करना कुम्भक ( कुम्भ शब्द भी प्रयुक्त होता है ) है । कुम्भक के १. द्र० यथेष्टं धारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम् । नादाभिव्यक्तिरारोग्यं भवेन् नाडीविशोधनात् ।। ( काशीखण्ड ); यदा नाडीविशुद्धिः स्यात् तदा चिह्नानि योगिनः । जायन्ते यानि देहे वै तानि मे गदतः शृणु । शरीर- लघुता दीप्तिर्जठराग्निविवर्धनम् । कृशत्वं च शरीरस्य तदा जायेत निश्चितम् ॥ ( दत्तात्रेय ) ।