BharatKosha
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

by आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य)

DevanagariHindipublished52 pages

Page 25 of 52

Read in context
Page 25

( ११ ) व्याख्या - 'केवल' एक विशेष प्रकार के कुम्भक का नाम है। इस कुम्भक के विषय में यहाँ जो कहा गया है, वह सहेतुक है। वह हेतु है-मनोन्मनी अवस्था के साथ इस कुम्भक का निकटतम सम्बन्ध (द्र० घेरण्ड० ५।६१)। 'केवल' कुम्भक की महत्ता 'केवले कुम्भके सिद्धे किं न सिद्ध्यति भूतले' (घेरण्ड० ५।९६) वाक्य जानी जाती है। हठयोग में 'बन्धत्रय' से मूल-उड्डोयान-जालन्धर नामक तीन बन्ध गृहीत होते हैं (द्र० ह० यो० प्र० १।४२ टीका। यहाँ 'केवल' कुम्भक के विषय में विशिष्ट सूचना दी गई है। पहली बात यह है कि दीर्घकाल पर्यन्त बन्धत्रय का अभ्यास करने के बाद ही इस कुम्भक का अभ्यास करना चाहिये। दूसरी बात यह है कि प्रयत्नपूर्वक रेचक करने के बाद अथवा पूरक करने के बाद यह अनुष्ठेय नहीं-रेचक-पूरक पर ध्यान न देकर इस कुम्भक का अभ्यास किया जाता है - 'रेचकं पूरकं त्यक्त्वा सुखं यद् वायु- धारणम्' यह हठयोगीय वाक्य इस कुम्भक का परिचायक है। यह कुम्भक विषय- प्रवाह का शोषक है अर्थात् विषय-सम्पर्क से इन्द्रिय में जो चाञ्चल्य होता है, वह चाञ्चल्य इस कुम्भक की अवस्था में नहीं होता। 'केवल' कुम्भक के लिए द्र० ह० यो० प्र० २।७२-७४; १।४३। अनाहत चेतसि सावधानेर् अभ्यासशूरै¹रनुभूयमाना । संस्तम्भितश्वासमनःप्रचारा सा जृम्भते केवलकुम्भकश्रीः । ९॥ [१. सूरैः (पाठा०)--यह अपपाठ है] अनुवाद--जब चित्त अनाहत चक्र में स्थिर हो जाता है तब श्वास और मन की क्रियायें स्तम्भित हो जाती हैं। इस अवस्था में 'केवल कुम्भक' का उत्कर्ष प्रकटित होता है। इस उत्कर्ष का अनुभव सावधान अभ्यासदक्ष साधक कर सकते हैं।

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक) · Page 25 of 52 · BharatKosha