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योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

by आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य)

DevanagariHindipublished52 pages

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( १४ ) उप० ३।१-९) । नाथयोग में इन नौ चक्रों की विशेष चर्चा है ( सिद्ध- सिद्धान्त-पद्धति, द्वितीय उपदेश; शान्तिपर्व ३१६।११ टीका । १ ब्रह्मबिन्दु- उपनिषद् में भी त्रिकूट का उल्लेख है ( ७० ) । यह तीन नाडियों का संयोगस्थल भ्रूमध्य है । उपर्युक्त त्रिकूट इससे भिन्न है । प्राणालय = प्राणका स्थैर्य अर्थात् गति का अभाव । प्राण जब तक ब्रह्मरन्ध्र में नहीं पहुँचता है तब तक यह लय संभव नहीं होता ( द्र० ज्योत्स्नाटीका ३।७५ ) । प्रत्याहतः केवलकुम्भकेन प्रबुद्ध१कुण्डल्युपभुक्तशेषः । प्राणः प्रतीचीनपथेन मन्दं विलीयते विष्णुपदान्तराले २ ॥१२॥ [ १. प्रभुक्तकुण्डल्यु.... ( पाठा० ); कुण्डली के प्रभुक्त विशेषण का कोई सार्थक्य प्रतीत नहीं होता । २. विष्णुपदे मनो मे ( पाठा० ) — इस पाठ को मानने पर 'विलीयते' क्रिया के दो कर्ता ( प्राण तथा मन ) मानने होंगे, जो अनुचित है । ] अनुवाद—प्रबुद्ध ( = जागरित ) कुलकुण्डलिनी के द्वारा उपभोग के बाद प्राण का जो अंश अवशिष्ट रहता है, वह कुम्भक के द्वारा प्रत्याहृत १. यहाँ 'तदुक्तं शिवयोगे' कहकर नौ चक्रों के प्रतिपादक कुछ श्लोक उद्धृत किये गये हैं । शान्तिपर्व के श्लोक में 'द्वादशैव तु चोदनाः' कहा गया है । इन १२ चोदनाओं की व्याख्या नीलकण्ठ इस प्रकार करते हैं— ( नवचक्र विवरण के बाद ) "एता नव चोदना वायुनिग्रहगर्भाताः । ततः शून्यात् परं समष्टिकार्ये मनो धारयेत् ततः कारणे ततो निष्कले इति तिस्र इति द्वादश चोदनाः" ।