योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
by आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य)
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Read in context( ३० ) तैजस ( स्वप्न-अवस्था-सम्बन्धी ), प्राज्ञ (सुषुप्ति-अवस्था-सम्बंधी ) तथा तुरीय (-स्वरूपस्थ-आत्म-सम्बन्धी ) । तुरीयतत्त्व का निर्देश ह० यो० प्र० ४।४८ में है । तुरीय-स्थिति शिवरूप ईश्वर की है अथवा सुखरूप आत्मा की है। आत्माकार या शिवाकार वृत्ति ही इस अवस्था में रहती है, अतः इसमें चित्त के वैषयिक चाञ्चल्य का सर्वथा अभाव हो जाता है—यह मृत्यु या काल की अतीत स्थिति है । योगनिद्रा की स्थिति विकल्पहीन है अर्थात् आत्मविषयक कोई भी भ्रान्त धारणा इस अवस्था में नहीं रहती । प्रकाशमाने परमात्मभानौ नश्यत्यविद्यातिमिरे समस्ते । अहो बुधा निर्मलदृष्टयोऽपि किञ्चिन्न पश्यन्ति जगत् समग्रम् ।। २७ ।। अनुवाद—अहो ! परमात्मा-रूप सूर्य का उदय तथा अविद्या रूप पूर्ण अन्धकार का नाश होने पर विद्वान् ( = आत्मज्ञ ) निर्मलदृष्टियुक्त होने पर भी समस्त जगत् में कुछ भी नहीं देख पाते हैं । व्याख्या--हठयोग के प्रतिपादक ग्रन्थों में परमात्मा शब्द प्रयुक्त होता है— द्र० ह० यो० प्र० ४।१०१; योगियाज्ञवल्क्य ९।१० । परमात्मा सबका प्रकाशक ( निर्विकार रूप से ) है, इसलिये भानु का दृष्टान्त दिया गया । तुल० तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ( श्वेताश्व० ६।१४ ) । अन्धकार के कारण वस्तुओं का ज्ञान नहीं हो पाता; अविद्या के कारण वस्तु का तत्त्वज्ञान नहीं होता, इसलिये अविद्या के साथ तिमिर ( = अन्धकार ) का प्रयोग पूर्वाचार्य करते हैं । इस श्लोक से यह ध्वनित होता है कि दर्शन-क्रिया के लिए सूर्यलोक, अन्धकारनाश तथा दृष्टिशक्ति--ये तीन आवश्यक हैं ।