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योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

by आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य)

DevanagariHindipublished52 pages

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प्राक्कथन ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् । एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥ राजयोग का प्रतिपादक श्लोकबद्ध योगतारावली¹-नामक ग्रन्थ योगाभ्यासियों में अत्यन्त प्रसिद्ध रहा है। इस ग्रन्थ को शंकराचार्य द्वारा विरचित माना जाता है। यही कारण है कि विभिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित शाङ्करग्रन्थावलियों में यह ग्रन्थ अवश्य संयोजित रहता है। पृथक् रूप से इस ग्रन्थ का प्रकाशन कदाचित् ही देखा जाता है। यह खेद का विषय है कि प्रस्तुत ग्रन्थ में वर्णित विषय यद्यपि अत्यन्त उच्चकोटि का है तथा इसकी भाषा भी कहीं-कहीं व्याख्या की अपेक्षा रखती है, तथापि इसकी कोई प्राचीन संस्कृत टीका प्रचलित नहीं है, जबकि शंकराचार्यकृत दार्शनिक-विचार-बहुल दक्षिणामूर्ति-स्तोत्र की टीका १. 'तारावली' शब्द का तात्पर्य विज्ञेय है। ताराओं की संख्या २७ हैं। यदि ग्रन्थ के मुख्य श्लोक २७ हों तो 'तारा' शब्द का प्रयोग ग्रन्थ-नाम में किया जा सकता है ( १-२ गौण श्लोक भी ऐसे नामवाले ग्रन्थों में कभी-कभी रहते हैं)। तारा की तरह नक्षत्र शब्द भी प्रयुक्त होता है। 'शिवपञ्चाक्षर- नक्षत्रमाला' (शंकराचार्यकृत) में २७ श्लोक हैं ( २७ मुक्ताओं से जो माला बनती है, वह नक्षत्रमाला कहलाती है, यह ज्ञातव्य है)।

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