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योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

by आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य)

DevanagariHindipublished52 pages

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( ३ ) की व्याख्या) । इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि इस ग्रन्थ को शंकर- विरचित मानना संशयास्पद है । यदि नन्दिकेश्वर नामक किसी आचार्य के द्वारा यह ग्रन्थ विरचित हो तब भी इस प्रश्न का समाधान ढूंढना होगा कि क्यों यह ग्रन्थ शंकराचार्य की कृति के रूप में प्रसिद्ध हुआ ? नन्दिकेश्वर का परिचय भी निर्धारणीय है । पुराणों में जिस शिलाद ऋषि के पुत्र नन्दिकेश्वर का चरित है २ ( जिनका मानव शरीर जीवित अवस्था में ही दैव शरीर में परिणत हो गया था; द्र० व्यासभाष्य २।१२-१३ ) वे इस ग्रन्थ के रचयिता हैं, ऐसा मानने का कोई आधार नहीं है । ग्रन्थकार ने श्रीशैल ( श्रीपर्वत ) में निवास करने की उत्कट इच्छा व्यक्त की है ( श्लोक २८ ) । लेखक का दक्षिणभारत का निवासी होना इससे ज्ञापित होता है । प्रस्तुत संस्करण का मुख्य वैशिष्ट्य यह है कि हमने श्लोकों के अर्थनिर्धारण में कहीं भी निराधार कल्पना का आश्रय नहीं लिया तथा व्याख्या में अनावश्यक विस्तार भी नहीं किया । श्लोक-प्रयुक्त शब्दों का अर्थ अन्यान्य योगग्रन्थों के आधार पर ही किया गया है—यह सहृदय पाठक देख सकते हैं । व्याख्या में जो सामग्री संकलित की गई है उसके आधार पर पाठक स्वयं भी श्लोकों के अर्थों का निर्धारण करने में समर्थ होंगे—ऐसा हम समझते हैं; साथ ही हम यह भी चाहते हैं कि पाठक स्वयं हमारी व्याख्या की युक्तायुक्तत्व की परीक्षा करें । हमें यह कहने में कोई भी संकोच नहीं है कि ग्रन्थोक्त कुछ विषय सर्वथा स्पष्ट नहीं हैं । इस २. द्र० शिवपु० ३।६ अ०; स्कन्दपु० केदारखण्ड ५।१११-११३; स्कन्दपु० काशीखण्ड ११।१०६; वराहपु० १४४।१६७; वराहपु० २१३।६९-७१; कूर्मपु० १।४३।१२८; २।४१।१७-४२ । विशद विवरण के लिए मेरा 'Nandin-a yogin' शीर्षक निबन्ध (Journal of the Yoga Institute, Bombay, Vol. XXVII. 8 में प्रकाशित ) पठनीय है ।

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