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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

by अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी)

DevanagariHindipublished485 pages

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १२१ एवमनुत्तरशक्त्योश्चतुरंशद्वन्द्वरूपिणी परा जाता । चतुरन्वयात्मिकेयं पश्यन्ती मातृकामयी विद्या ॥ सृष्टिः पूर्वाम्नायो वाग्भवबीजं तदात्मकं त्रिविधम् । सृष्टिस्थितिसंहारैर्भिन्ना सृष्टिस्त्रिमूर्तिमूर्तिः स्यात् ॥ ब्रह्माऽत्र सृष्टिसृष्टावधिपतिरेतस्य भारती शक्तिः। सोऽयं हस्यार्थः स्यात् स एव शिव शक्तिवाचकश्चापि¹ ॥ ²हस्यार्थः स्यादत्र स्वशक्तिमयरूपसार्णसंयोगात् । सृष्टिस्थितौ तु विष्णुः कर्ता विश्वम्भराऽस्य शक्तिः स्यात् ॥ विष्णुः कलिपेरर्थो ललिपेरेतस्य शक्तिरर्थः स्यात् । रुद्रोऽधिपतिः शक्तौ रौद्री स्यात् तत्र सृष्टिसंहारे ॥ हरवर्णयुगलमनयोर्वाचकमर्थोऽत्र रस्य रुद्रः स्यात् । रुद्राक्षरसम्पर्काद् रौद्री तच्छक्तिरत्र हस्यार्थः ॥ तरह से पराशक्ति अनुत्तर (अकार) और शक्ति (हकार) के चार-चार अंशों के संयोग से जब चार युगलस्वरूपों का रूप धारण कर लेती है, तब परा वाणी ही चार अन्वयों वाली ¹पश्यन्ती वाणी के रूप में परिणत हो जाती है ॥ इसका वाग्भव बीज सृष्टि दशा और पूर्वाम्नाय का सूचक है । सृष्टि दशा सृष्टि, स्थिति और संहार के भेद से विभक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और और रुद्र रूप त्रिमूर्ति का स्वरूप धर लेती है ॥ यहां सृष्टि स्वरूप सृष्टि विभाग के अधिपति ब्रह्मा और उनकी शक्ति भारती है । मूलविद्या में स्थित हकार लिपि से इन्हीं का बोध होता है । यही अक्षर शिव और शक्ति का भी वाचक है। इस अर्थ की अभिव्यक्ति के लिये यह हकार लिपि सकार लिपि से संयुक्त हो जाती है, क्योंकि सकार लिपि हकार की शक्ति मानी जाती है ॥ सृष्टिस्थिति विभाग के अधिपति विष्णु और विश्वम्भरा (पृथ्वी) उनकी शक्ति है। मूलविद्या में स्थित क-लिपि विष्णु का और ल-लिपि इसकी शक्ति का बोध कराती है ॥ सृष्टिसंहार विभाग के अधिपति रुद्र और रुद्राणी उनकी शक्ति है। ह र वर्णयुगल इनके वाचक हैं। इनमें से रकार का अर्थ रुद्र और हकार का अर्थ रुद्राणी नामक उसकी शक्ति है। रुद्र (रकार) अक्षर के सम्पर्क के कारण ही यह शक्ति रौद्री कही जाती है। तृतीय बीज का नाम शक्ति- १. वाचकस्यापि-क. ज. झ. उ. । २. सस्यार्थः-ग. ने. ज. झ. उ. ।

  1. एकादशधा विभक्त पश्यन्ती वाणी का परिचय कामकलाविलास (श्लो० २३-२४) में तथा अर्थरत्नावली (पृ० ३५-३६) में दिया गया है। इस प्रसंग में अर्थरत्नावली में उद्धृत संकेतपद्धति के श्लोकों को यहाँ (२।६३-६४) दीपिकाकार ने भी उद्धृत किया है। सौभाग्यसुधोदय के इस लम्बे उद्धरण से इन सभी ग्रन्थों के प्रस्तुत विषय की भी व्याख्या हो जाती है।