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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

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अध्याय २ खण्ड १३ मन्त्र १ १०५ ॥ एकादशः खण्डः ॥ मनो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद्वायत्रं प्राणेषु प्रोतम्॥ १ ॥ अब गायत्र सम्बन्धी विशिष्ट उपासना का वर्णन किया जाता है। मन हिंकार है, वाणी प्रस्ताव है, नेत्र उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है, प्राण निधन है। यह गायत्र-साम प्राणों में प्रतिष्ठित है॥ १॥ स य एवमेतद्वायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या महामनाः स्यात्तद्व्रतम्॥ २॥ जो साधक इस प्रकार गायत्र-साम को प्राणों में अधिष्ठित हुआ जानता है (अनुभव करता है); वह प्राणवान् होता है, पूर्ण आयु को भोगता है और तेजस्वी जीवन जीता है। वह प्रजाओं तथा पशुओं से समृद्ध होता है, महान् यशस्वी होता है, वह महामना बने, ऐसा उसका व्रत होता है (अर्थात् गायत्र उपासक को महामना-उदारचित्त होना चाहिए) ॥ २॥ ॥ द्वादशः खण्डः ॥ अभिमन्थति स हिंकारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनः सँशाम्यति तन्निधनमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतम्॥ १ ॥ अभिमन्थन से उत्पन्न अग्नि हिंकार है। धूम्रयुक्त अग्नि प्रस्ताव है, प्रज्वलित अग्नि उद्गीथ है, अङ्गारयुक्त अग्नि प्रतिहार है, अग्नि का उपशमन (बुझने लगना) निधन है। अग्नि का सर्वथा शमन होना भी निधन है। यह रथन्तर साम अग्नि में प्रतिष्ठित है॥ १॥ स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न प्रत्यङ्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत्तद्व्रतम्॥ जो साधक इस प्रकार रथन्तर साम को अग्नि में प्रतिष्ठित जानता है, वह ब्रह्मतेज से सम्पन्न प्रदीप्त जठराग्नि से युक्त होता है। वह पूर्ण जीवन का उपभोग करता है, तेजोमय जीवन व्यतीत करता है। प्रजाओं तथा पशुओं से सम्पन्न होता है। वह महान् कीर्ति से सम्पन्न वृद्धि को प्राप्त होता है। अग्नि की ओर मुख करके साधक भक्षण न करे और न ही थूके-यही उसका व्रत होता है॥ २॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम्॥ १ ॥ अब स्त्री-पुरुष के जोड़े के रूप में वामदेव्य साम की उपासना का वर्णन किया जाता है। पुरुष का संकेत देना हिंकार है। अपनी अभिव्यक्ति प्रस्ताव है। शयन उद्गीथ है। उस समय अनुकूल व्यवहार प्रतिहार है। स्नेह और सौहार्द्र पूर्वक साथ-साथ समय व्यतीत करना निधन है। यह वामदेव्य साम स्त्री- पुरुष के जोड़े में प्रतिष्ठित है॥ १॥ [ ऋषि ने दाम्पत्य और उनके माध्यम से चलने वाले प्रजनन चक्र को वामदेव्य साम के अन्तर्गत कहा है। कुछ लोग इस प्रसंग पर अश्लीलता का आरोप लगाते हैं; किन्तु ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ऋषि प्रकृति-प्रवाह

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