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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

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१०६ छाान्दोग्योपनिषद के अन्तर्गत चलने वाले प्राण-प्रवाह के विभिन्न चक्रों की व्याख्या विभिन्न साम साधनाओं के रूप में कर रहे हैं। पुरुष-नारी द्वारा संचालित प्रजनन विज्ञान (जेनेटिक साइन्स) को छोड़ा कैसे जा सकता था? वे (ऋषि) तो एक विशिष्ट साम (प्राणों से प्राणी के विकास की श्रेष्ठ साधना) देखते हैं। अस्तु, इस ज्ञान-विज्ञान के प्रसंग में कहीं अश्लीलता की गंध लेने का प्रयास नहीं करना चाहिए।] स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनीभवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न कां च न परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक दाम्पत्य जीवन को वामदेव्य साम से ओत-प्रोत जानकर तदनुसार व्यवहार करता है, वह सुख से परिपूर्ण रहता है। वह सुसन्तति प्राप्त करता है, वह पूर्ण आयु का उपभोग करता है, तेजोमय जीवन जीता है तथा प्रजाओं एवं पशुओं से समृद्ध होता है। वह महान् कीर्ति से वृद्धि को प्राप्त करता है। वह किसी का (अपनी पत्नी का) कभी परित्याग न करे। यही साधक का व्रत है॥ २॥ ॥ चतुर्दशः खण्डः ॥ उद्यन्हिङ्कार उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽपराह्नः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेत- द्बृहदादित्ये प्रोतम् ॥ १ ॥ उदीयमान सूर्य हिंकार है, उदित हुआ सूर्य प्रस्ताव है, मध्याह्नकालिक सूर्य उद्गीथ है, अपराह्न कालिक सूर्य प्रतिहार है, अस्त होने वाला सूर्य निधन है। यह बृहत्साम सूर्य में अधिष्ठित है॥ १॥ स य एवमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्र्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक इस प्रकार बृहत्साम को सूर्य में स्थित जानता है, वह तेजस्वी और प्रदीप्त जठराग्नि से सम्पन्न होता है। वह पूर्ण आयु का उपभोग करता है, तेजोमय जीवन व्यतीत करता है। वह सुसन्तति और पशुओं से समृद्ध होता है, वह महान् कीर्ति से वृद्धि को प्राप्त करता है। वह प्रखर सूर्य की कभी निन्दा न करे- यही साधक का व्रत है॥ २॥ ॥ पञ्चदशः खण्डः ॥ अभ्राणि संप्लवन्ते स हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतम् ॥ १ ॥ मेघों का एकत्र होना हिंकार है। मेघों का बनना प्रस्ताव है। मेघों का जल बरसाना उद्गीथ है। बिजली का चमकना और कड़कना प्रतिहार है, वर्षा का समाप्त होना निधन है। यह वैरूप साम पर्जन्य में प्रतिष्ठित है॥ १॥ स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपाँश्च सुरूपाँश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक इस प्रकार वैरूप साम को पर्जन्य में अधिष्ठित जानता है, वह विरूप और सुरूप पशुओं का स्वामी होता है, पूर्ण आयु का उपभोग करता है, ज्योतिर्मय जीवन व्यतीत करता है। वह सुसन्तति और पशुओं से समृद्ध होता है। वह महान् कीर्ति से प्रतिष्ठित होता है। वह बरसते मेघों की निन्दा न करे- यह उसका व्रत होता है॥ २ ॥