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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

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अध्याय २ खण्ड १८ मन्त्र २ १०७ ॥ षोडशः खण्डः ॥ वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतम्॥ १ ॥ वसन्त ऋतु हिंकार है, ग्रीष्म ऋतु प्रस्ताव है, वर्षा ऋतु उद्गीथ है, शरद् ऋतु प्रतिहार है, हेमंत ऋतु निधन है। यह वैराज साम ऋतुओं में अधिष्ठित है ॥ १ ॥ स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्यर्तूंन्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक इस प्रकार वैराज साम को ऋतुओं में अधिष्ठित जानता है, वह सुसन्तति, पशु आदि सम्पदा एवं ब्रह्मतेज से सम्पन्न होता है। वह पूर्ण आयु का उपभोग करता है, ज्योतिर्मय जीवन व्यतीत करता है, सुसन्तति और पशुओं से समृद्ध होता है, कीर्ति से सम्पन्न होकर वृद्धि पाता है। साधक ऋतुओं की निन्दा न करे- यही उसका व्रत होता है ॥ २ ॥ ॥ सप्तदशः खण्डः ॥ पृथिवी हिंकारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्कर्यो लोकेषु प्रोताः ॥ १ ॥ पृथिवी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, द्युलोक उद्गीथ है, दिशाएँ प्रतिहार हैं और समुद्र निधन है। यह शक्करी साम लोकों में अधिष्ठित है ॥ १ ॥ स य एवमेताः शक्कर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक इस प्रकार शक्करी साम को लोकों में अधिष्ठित जानता है, वह लोकों की विभूतियों से सम्पन्न होता है, वह सम्पूर्ण आयु का उपभोग करता है, तेजस्वी जीवन जीता है। वह सुसन्तति और पशुओं से समृद्ध होता है, कीर्ति से वृद्धि को पाता है। वह साधक लोकों की निन्दा न करे- यही उसका व्रत है ॥ ॥ अष्टादशः खण्डः ॥ अजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः ॥ १ ॥ बकरी हिंकार है, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, घोड़े प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है- यह रेवती साम पशुओं में अधिष्ठित है ॥ १ ॥ स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान्भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या पशून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक इस प्रकार रेवती साम को पशुओं में अधिष्ठित जानता है, वह पशुओं से समृद्ध होता है, वह पूर्ण आयु का उपभोग करता है, तेजस्वी जीवन जीता है। वह सुसन्तति और पशुओं से समृद्ध होता है। वह कीर्ति के द्वारा महान होता है। वह साधक पशुओं की निन्दा - यही उसका है॥ २ ॥