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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

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१३८ छान्दोग्योपनिषद् ॥ सप्तदशः खण्डः ॥ प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेषां तप्यमानानाꣳ रसान्प्रावृहदग्निं पृथिव्या वायुमन्त- रिक्षादादित्यं दिवः ॥ १ ॥ प्रजापति ब्रह्मा ने लोकों का सार ग्रहण करने के निमित्त तप किया। तप के प्रभाव से उन्होंने लोकों से रसों को उत्पन्न किया। पृथ्‍वी से अग्नि, अन्तरिक्ष से वायु और द्युलोक से आदित्य को ग्रहण किया॥ १ ॥ स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत्तासां तप्यमानानाꣳ रसान्प्रावृहदग्नेर्ऋचो वायोर्र्यजूꣳषि सामान्यादित्यात् ॥ २ ॥ फिर उन्होंने तीन देवों से सार ग्रहण करने के निमित्त तप किया। तप के प्रभाव से उन्होंने देवों से रसों को उत्पन्न किया। अग्निदेव से ऋक्, वायुदेव से यजुष् और आदित्यदेव से साम को ग्रहण किया॥ २ ॥ स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत्तस्यास्तप्यमानाया रसान्प्रावृहद्भूरित्यृग्भ्यो भुवरिति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥ ३ ॥ फिर उन्होंने इस त्रयी विद्या का सार ग्रहण करने के निमित्त तप किया। तप के प्रभाव से उन्होंने त्रयी विद्या से रसों को उत्पन्न किया। ऋचाओं से भूः, यजुः कण्डिकाओं से भुवः तथा साम मंत्रों से स्वः को ग्रहण किया ॥ ३ ॥ तद्यदृक्तो रिष्येद्भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयादृचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य विरिष्टꣳ संदधाति ॥ ४ ॥ यदि ऋचाओं के यज्ञ में कोई त्रुटि हो, तो 'भूः स्वाहा' ऐसा कहकर गार्हपत्याग्नि में यज्ञ करे। इस प्रकार ऋचाओं के रस से ऋचाओं के बीज द्वारा ऋचा सम्बन्धी यज्ञ की त्रुटियों की पूर्ति होती है ॥ ४ ॥ अथ यदि यजुष्टो रिष्येद्भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयाद्यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्टꣳ संदधाति ॥ ५ ॥ यदि यजुः कण्डिकाओं के यज्ञ में कोई त्रुटि हो, तो 'भुवः स्वाहा' ऐसा कहकर दक्षिणाग्नि में आहुति देनी चाहिए। इस प्रकार यजुओं के रस से यजुओं के बीज द्वारा यजुष् सम्बन्धी यज्ञ की पूर्ति होती है॥ ५॥ अथ यदि सामतो रिष्येत्स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात्सामामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्टꣳ संदधाति ॥ ६ ॥ यदि साम मंत्रों के यज्ञ में कोई त्रुटि हो, तो 'स्वः स्वाहा' इस उच्चारण के साथ आहवनीयाग्नि में आहुति देनी चाहिए। इस प्रकार साम मंत्रों के रस से साम के बीज द्वारा साम सम्बन्धी यज्ञ की पूर्ति होती है ॥ ६ ॥ तद्यथा लवणेन सुवर्णꣳ संदध्यात्सुवर्णेन रजतꣳ रजतेन त्रपु त्रपुणा सीसꣳ सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ॥ ७ ॥ जिस प्रकार लवण से सोने को, सोने से चाँदी को, चाँदी से राँगा को, राँगे से सीसे को, सीसे से लोहे को, लोहे से काष्ठ को और चमड़े से काष्ठ को जोड़ा जाता है ॥ ७ ॥

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