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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

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अध्याय ४ खण्ड १७ मन्त्र १० १३१ एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टः संदधाति भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवति ॥ ८ ॥ उसी प्रकार इन लोकों, देवों और तीनों वेदों के सार से यज्ञ के छिद्र (दोष) का सुधार किया जाता है। जिस यज्ञ में इस प्रकार जानने वाला ब्रह्मा होता है, वह यज्ञ निश्चय ही ओषधियों (आहुतियों) से संस्कारित (प्रभावयुक्त) होता है ॥ ८ ॥ एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद्ब्रह्मा भवत्येवंविदः ह वा एषा ब्रह्माणमनु गाथा यतो यत आवर्तते तत्तद्गच्छति ॥ ९ ॥ जिस यज्ञ में इस प्रकार जानने वाला ब्रह्मा होता है, वह यज्ञ उत्तर मार्ग को प्राप्त कराता है। इस प्रकार ज्ञान-सम्पन्न ब्रह्मा के प्रति यह उक्ति कही गई है- जहाँ भी वह यज्ञ में प्रवृत्त होता है, वह यज्ञ के अभीष्ट को प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विक्कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानः सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥ १० ॥ इस प्रकार ब्रह्मा मनन करने वाला एक ऋत्विक् होता है। जिस प्रकार घोड़ी सब योद्धाओं की रक्षा करती है, उसी प्रकार ब्रह्मा यज्ञ की, यजमान की और सब ऋत्विजों की सब ओर से रक्षा करता है। अतः इस प्रकार ज्ञान-सम्पन्न को ही ब्रह्मा बनाएँ, ऐसा न जानने वाले को न बनाएँ, कभी न बनाएँ ॥ १० ॥