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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

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७२ केनोपनिषद् यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ जो यह मानता है कि ब्रह्म जानने में नहीं आता, वह ब्रह्म को जानता है एवं जो यह मानता है कि मैं ब्रह्म को जानता हूँ, वह उसे नहीं जानता; क्योंकि जानने का अभिमान करने वालों के लिए वह ब्रह्म जाना हुआ नहीं है और जानने के अभिमान से रहित पुरुष के लिए वह जाना हुआ है ॥ ३ ॥ प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ वह बोध जिसके द्वारा प्रत्येक वस्तु का ज्ञान प्राप्त हो जाता है , उसी से मनुष्य अमृत स्वरूप परब्रह्म को प्राप्त करता है । आत्मा ( अथवा आत्मज्ञान ) के द्वारा मनुष्य बल को प्राप्त करता है, उसी आत्मा के बल को जानने की विद्या से वह अमृतस्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर लेता है ॥ ४ ॥ इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ ५ ॥ जिसने यदि इसी जन्म में उस परब्रह्म को प्राप्त कर लिया, तो उसने यथार्थ ( लक्ष्य ) पा लिया, जो इस जीवन में उसे नहीं जान पाया, तो उसने ( अमूल्य अवसर गँवाकर ) अपनी महती हानि की । अतः बुद्धिमान् पुरुष प्रत्येक प्राणी में और प्रत्येक तत्त्व में उस परमात्म सत्ता को व्याप्त जानकर इस लोक से प्रयाण कर अमर हो जाते हैं ॥ ५ ॥ ॥ तृतीयः खण्डः ॥ पिछले दो खण्डों में प्रत्येक दिव्य प्रवाह की शक्ति के मूल कारण रूप जिस परमात्म तत्त्व की विवेचना की गयी है, अगले दो खण्डों में उसी तथ्य को कथानक के माध्यम से स्पष्ट किया गया है- ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽ स्माकमेवायं महिमेति ॥ १ ॥ ( एक समय) उस ब्रह्म ने देवों को निमित्त बनाकर असुरों पर विजय प्राप्त की; परन्तु देवों को उस विजय का अभिमान हो गया और वे इस विजय को अपनी ही महिमा का प्रभाव समझने लगे ॥ १ ॥ तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥ उस ब्रह्म ने देवों के उस अहं भाव को जान लिया और तब उनके सामने वह यक्ष रूप में प्रकट हुआ, परन्तु देवगण उसे नहीं पहचान सके और कहने लगे -'यह दिव्य यक्ष कौन है' ॥ २ ॥ तेऽ ग्रिमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥ ३ ॥ देवों ने अग्नि से कहा- हे देव ! आप पता लगाएँ कि यह कौन है ? इस पर उन्होंने कहा- बहुत अच्छा। तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽ सीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ अग्निदेव तेजी से दौड़कर यक्षरूप ब्रह्म के पास पहुँचे । यक्ष ने पूछा- आप कौन हैं ? इस पर अग्निदेव ने कहा- मैं अग्नि हूँ, मुझे ही लोग जातवेदा कहते हैं ॥ ४ ॥ तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदं सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥ यक्ष ने अग्निदेव मे पूछा- आप में क्या शक्ति है ? ऐसा पूछे जाने पर अग्निदेव ने कहा- मैं चाहूँ तो इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, उसे भस्म कर सकता हूँ ॥ ५ ॥