भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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खण्ड ४ मन्त्र १ ७३ तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥ तब यक्ष ने अग्निदेव के समक्ष एक तिनका रखकर उसे भस्म करने के लिए कहा; परन्तु अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी वे उसे जलाने में समर्थ नहीं हुए। तब वे वहाँ से लौटकर देवों से कहने लगे- मैं इस दिव्य यक्ष को जानने में असमर्थ रहा ॥ ६ ॥ अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥ ७ ॥ तदनन्तर देवों ने वायुदेव से कहा- हे वायुदेव ! इस रहस्य का आप ही पता लगाएँ। उस दिव्य यक्ष के विषय में पता लगाना उन्होंने स्वीकार किया ॥ ७ ॥ तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ वायुदेव द्रुतगति से दौड़कर उस यक्ष के पास पहुँचे। यक्ष द्वारा परिचय पूछा गया- आप कौन हैं ? वायुदेव ने कहा- मैं प्रसिद्ध वायुदेव हूँ। मुझे ही मातरिश्वा कहते हैं ॥ ८ ॥ तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदं सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ९ ॥ यक्ष ने पूछा- आपमें क्या सामर्थ्य है ? वायुदेव बोले- इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, मैं उसे उड़ा ले जा सकता हूँ ॥ ९ ॥ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ १० ॥ तब उस यक्ष ने उनके सामने तिनका रखकर उसे उड़ाने के लिए कहा; परन्तु अपनी सारी शक्ति लगाकर भी वायुदेव उसे उड़ा सकने में समर्थ नहीं हुए। तब वहाँ से लौटकर उन्होंने देवों के सामने उस यक्ष को समझ पाने में अपनी असमर्थता व्यक्त की ॥ १० ॥ अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति। तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे ॥ तब देवों ने इन्द्रदेव से कहा- हे मघवन् ! आप ही इस बात का पता लगाएँ कि यह यक्ष कौन है ? इन्द्रदेव ने यक्ष के विषय में पता लगाना स्वीकार किया और यक्ष की ओर दौड़े; परन्तु इन्द्रदेव के वहाँ पहुँचते ही यक्ष अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥ स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाꣳ हैमवतीं ताꣳ होवाच किमेतद्यक्षमिति ॥ १२ ॥ तब इन्द्रदेव उसी आकाश में स्थित अतिशय शोभामयी भगवती हैमवती (हिमाचल पुत्री) उमादेवी के पास (आ) गये और उनसे पूछने लगे-यह यक्ष कौन था ? ॥ १२ ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति ततो हैव विदांचकार ब्रह्मेति ॥ उमादेवी बोलीं- वे ब्रह्म हैं, उनकी विजय को तुम लोगों ने अपने अहम्भाव से अपनी विजय मान लिया था। देवी उमा के इस उत्तर से इन्द्रदेव ने स्पष्ट समझ लिया कि वह दिव्य यक्ष निश्चय ही ब्रह्म थे ॥ १ ॥