१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
खण्ड ४ मन्त्र १ ७३ तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥ तब यक्ष ने अग्निदेव के समक्ष एक तिनका रखकर उसे भस्म करने के लिए कहा; परन्तु अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी वे उसे जलाने में समर्थ नहीं हुए। तब वे वहाँ से लौटकर देवों से कहने लगे- मैं इस दिव्य यक्ष को जानने में असमर्थ रहा ॥ ६ ॥ अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥ ७ ॥ तदनन्तर देवों ने वायुदेव से कहा- हे वायुदेव ! इस रहस्य का आप ही पता लगाएँ। उस दिव्य यक्ष के विषय में पता लगाना उन्होंने स्वीकार किया ॥ ७ ॥ तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ वायुदेव द्रुतगति से दौड़कर उस यक्ष के पास पहुँचे। यक्ष द्वारा परिचय पूछा गया- आप कौन हैं ? वायुदेव ने कहा- मैं प्रसिद्ध वायुदेव हूँ। मुझे ही मातरिश्वा कहते हैं ॥ ८ ॥ तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदं सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ९ ॥ यक्ष ने पूछा- आपमें क्या सामर्थ्य है ? वायुदेव बोले- इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, मैं उसे उड़ा ले जा सकता हूँ ॥ ९ ॥ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ १० ॥ तब उस यक्ष ने उनके सामने तिनका रखकर उसे उड़ाने के लिए कहा; परन्तु अपनी सारी शक्ति लगाकर भी वायुदेव उसे उड़ा सकने में समर्थ नहीं हुए। तब वहाँ से लौटकर उन्होंने देवों के सामने उस यक्ष को समझ पाने में अपनी असमर्थता व्यक्त की ॥ १० ॥ अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति। तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे ॥ तब देवों ने इन्द्रदेव से कहा- हे मघवन् ! आप ही इस बात का पता लगाएँ कि यह यक्ष कौन है ? इन्द्रदेव ने यक्ष के विषय में पता लगाना स्वीकार किया और यक्ष की ओर दौड़े; परन्तु इन्द्रदेव के वहाँ पहुँचते ही यक्ष अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥ स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाꣳ हैमवतीं ताꣳ होवाच किमेतद्यक्षमिति ॥ १२ ॥ तब इन्द्रदेव उसी आकाश में स्थित अतिशय शोभामयी भगवती हैमवती (हिमाचल पुत्री) उमादेवी के पास (आ) गये और उनसे पूछने लगे-यह यक्ष कौन था ? ॥ १२ ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति ततो हैव विदांचकार ब्रह्मेति ॥ उमादेवी बोलीं- वे ब्रह्म हैं, उनकी विजय को तुम लोगों ने अपने अहम्भाव से अपनी विजय मान लिया था। देवी उमा के इस उत्तर से इन्द्रदेव ने स्पष्ट समझ लिया कि वह दिव्य यक्ष निश्चय ही ब्रह्म थे ॥ १ ॥
७४ केनोपनिषद् तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्देवान्यदग्निर्वायुरिन्द्रस्तेन ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेति ॥ २ ॥ ये तीनों देव-अग्नि, वायु और इन्द्रदेव अन्य देवों की अपेक्षा श्रेष्ठ माने जाते हैं; क्योंकि ब्रह्म को शक्ति के रूप में इन्हीं देवों ने सर्वप्रथम समझा और ब्रह्म का निकट से साक्षात्कार किया ॥ २ ॥ तस्माद्वा इन्द्रोऽ तितरामिवान्यान्देवान्स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेति ॥ निकट से ब्रह्म का स्पर्श करने से, सबसे पहले जान लेने से इन्द्रादि देवगण अन्य देवों की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं ॥ ३ ॥ तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा ३ इतीन्त्यमीमिषदा ३ इत्यधिदैवतम् ॥ ४ ॥ (इन्द्रदेव के सम्मुख यक्ष का अन्तर्धान हो जाना) ब्रह्म की उपस्थिति का संकेत बिजली के चमकने और पलक के झपकने जैसा होता है । इसे उसका सूक्ष्म आधिदैविक संकेत समझना चाहिए ॥ ४ ॥ अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽ नेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णᳵ संकल्पः ॥ ५ ॥ आध्यात्मिक दृष्टि से यह समझना चाहिए कि मन जो ब्रह्म के पास जाता हुआ सा प्रतीत होता है और ब्रह्म का स्मरण करता हुआ सा लगता है तथा ब्रह्म प्राप्ति का संकल्प करता हुआ सा भासित होता है । (यह भी ब्रह्म की उपस्थिति का सूक्ष्म संकेत है ) ॥ ५ ॥ तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाऽ भि हैनᳵ सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥ ६ ॥ समस्त प्राणी उस ब्रह्म से प्रेम करते हैं और उसे पाना चाहते हैं, वह तद्वन नाम से प्रसिद्ध है । ब्रह्म के इसी 'तद्वन' स्वरूप की सभी को उपासना करनी चाहिए। जो साधक ब्रह्म के इस स्वरूप को जान लेता है, उसे सब प्राणी अपना प्रिय मानने लगते हैं ॥ ६ ॥ [ ऋषि ने ब्रह्म को 'तद्वन' कहा है । आचार्य शंकर ने इसका अर्थ तद्-भजनीयम् (वह ध्यान करने योग्य है) किया है । 'वन'- रस के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है, इस आधार पर ब्रह्म मूल रूप से 'रस स्वरूप' है - ऐसा बोध होता है। ऋषि का मानना है कि जिस साधक की गति आत्म तत्त्व में हो जाती है, उसकी आत्मीयता का विस्तार इतना हो जाता है कि उसके प्रभाव में सभी प्राणी आ जाते हैं।] उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता य उपनिषद्ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ७ ॥ (ब्रह्म विद्या के इस सांकेतिक उपदेश को न समझ पाने के कारण पुनः शिष्य कहता है) हे गुरुदेव ! हमें ब्रह्मविद्या स्वरूप उपनिषद् का उपदेश दें। तब उन्होंने कहा कि अभी तक जो कुछ भी कहा गया है, वही ब्रह्मविद्या है, तुम्हें निश्चय ही मैंने ब्रह्मविद्या सिखा दी है ॥ ७ ॥ तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥ ८ ॥ तपस्या, मन एवं इन्द्रियों का नियन्त्रण तथा आसक्ति रहित श्रेष्ठ कर्म-ये ही ब्रह्मविद्या प्राप्ति के आधार हैं। वेद में इस विद्या का सविस्तार वर्णन है। सत्यस्वरूप ब्रह्म ही इस विद्या का प्राप्य-लक्ष्य है ॥ ८ ॥ यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्टति प्रतितिष्ठति ॥ ९ ॥ इस ब्रह्मविद्या के रहस्य को भली-भाँति जानने वाला साधक अपने समस्त पापसमूह को विनष्ट कर अविनाशी, असीम एवं सर्वश्रेष्ठ स्थिति में पहुँच जाता है - परमधाम को प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥ ॥ इति केनोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ गायत्र्युपनिषद् ✪॥ यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध गोपथ ब्राह्मण की ३१ से ३८ तक की आठ कण्डिकाओं के संकलन रूप में है। इसमें मौद्गल्य और मैत्रेय ऋषियों के संवाद के माध्यम से गायत्री महाविद्या का विवेचन किया गया है। पहली दूसरी कण्डिका में भूमिका भाग तथा गायत्री मंत्र के सवितुः, वरेण्यं, भर्गः, देवस्य, धियः, प्रचोदयात् आदि शब्दों को परिभाषित किया गया है। तीसरी कण्डिका में सविता और सावित्री की अभिन्नता तथा उनके विविध रूपों का वर्णन है। चौथी, पाँचवीं एवं छठवीं कण्डिकाओं में क्रमशः गायत्री महामन्त्र के तीनों चरणों की व्याख्या और उनके विस्तार का उल्लेख है। सातवीं-आठवीं कण्डिका में ब्रह्म, यज्ञ और ब्राह्मण की समस्वरता की व्याख्या की गई है। ॥ प्रथमा कण्डिका ॥ एतद्ध स्मैतद्विद्वांसमेकादशाक्षम्मौद्गल्यं ग्लावो मैत्रेयोऽभ्याजगाम स तस्मिन् ब्रह्मचर्यं वसतो विज्ञायोवाच किं स्विन्मर्या अयं तं मौद्गल्योऽध्येति यदस्मिन् ब्रह्मचर्ये वसतीति ॥ ग्यारह अक्षों (ज्ञान अथवा ज्ञानेन्द्रियों) वाले विद्वान् मौद्गल्य (मुद्गल वंशीय) के पास ग्लाव मैत्रेय (मित्रयु के शिष्य अथवा गोत्र वाले) आये। वे मौद्गल्य के आश्रम में निवासरत ब्रह्मचारियों को देखकर उनसे (उपहास करते हुए) कहने लगे- यह मौद्गल्य अपने ब्रह्मचारियों को क्या पढ़ाता है ? ॥१॥ [ 'ग्यारह अक्ष' यह सम्बोधन उनके विशेष ज्ञाता होने का प्रमाण है। दस इन्द्रियों या दस प्राणों (५ प्राण+५ उपप्राणों) के अतिरिक्त जिनका आत्म तत्त्व भी जाग्रत् है, उन्हें ११ अक्षों-पहलुओं वाला कहा गया है।] तद्धि मौद्गल्यस्यान्तेवासी शुश्राव सः आचार्यायाव्रज्याचचक्षे दुरधीयानं वा अयं भवन्तमवोचद्योऽयमद्यातिथिर्भवति किं सौम्य विद्वानिति। त्रीन् वेदान् ब्रूते भो३इति ॥ २ ॥ मौद्गल्य के ब्रह्मचारी ने यह बात सुनकर अपने आचार्य से जाकर कहा- जो आज यह अतिथि हैं, उन्होंने आपको अज्ञानी बताया है। मौद्गल्य ने पूछा- क्या वे विद्वान् हैं ? शिष्य ने उत्तर दिया- हा देव ! वे तीनों वेदों के उपदेशक हैं ॥ २ ॥ तस्य सौम्य यो विस्पष्टो विजिगीषोऽन्तेवासी तन्मे ह्वयेति ॥ ३ ॥ हे सौम्य ! उनका जो विद्वान्, तत्त्वदर्शी तथा विजयाकांक्षी शिष्य है, उसे तुम मेरे पास ले आओ, मौद्गल्य ने अपने शिष्य से कहा ॥ ३ ॥ तमाजुहाव तमभ्युवाचासाविति भो३इति किं सौम्य त आचार्योऽध्येतीति, त्रीन् वेदान् ब्रूते भो३इति ॥ ४ ॥ ✪ इस नाम की २ उपनिषदें उपलब्ध होती हैं। एक शतपथ ब्राह्मण (१४.५.१.१-८) के बृहदारण्यकोपनिषद् (५.१४.१-८) के अन्तर्गत आती है, दूसरी गोपथ ब्राह्मण (१.३१-३८) के अन्तर्गत। इस संग्रह में शतपथ ब्राह्मण के अन्तर्गत वर्णित गायत्री उपनिषद् तो बृहदारण्यको० में उपलब्ध है ही। अस्तु, उसकी पुनरावृत्ति समीचीन न मानकर गोपथ ब्राह्मण वाली उपनिषद् को ही चयनित किया गया है।
७६ गायत्रीप्युपनिषद् वह उसे बुला लाया और आचार्य से कहने लगा- गुरुवर! वह यह है। उन्होंने उनसे पूछा- हे सोम्य! तुम्हारे आचार्य तुम्हें क्या पढ़ाते हैं? शिष्य ने कहा- श्रीमन्! वे तीनों वेदों के उपदेशक हैं ॥ ४ ॥ यन्नु खलु सौम्यास्माभिः सर्वे वेदा मुखतो गृहीताः कथन्त एवमाचार्यो भाषते कथं नु शिष्टाः शिष्टेभ्य एवं भाषेरन् यं होनमहं प्रश्नं प्रच्छामि न तं विवक्ष्यति न होनमध्यैतीति ॥ हे सोम्य! क्योंकि हमने सब वेद मुखाग्र ग्रहण किये हैं, तुम्हारे आचार्य ऐसा क्यों कहते हैं कि मैं अज्ञानी हूँ। क्या उन्हें नहीं ज्ञात है कि शिष्ट लोग शिष्टों से कैसे वार्त्ता करते हैं? अब मैं जिस प्रश्न को पूछता हूँ यदि वे नहीं बताएँगे, तो इसका तात्पर्य होगा कि वे वेद नहीं पढ़ाते हैं ॥ ५ ॥ तां भवान् प्रब्रवीत्विति स चेत्सौम्य दुरधीयानो भविष्यत्याचार्योवाच ब्रह्मचारी ब्रह्मचारिणे सावित्रीं प्राहेति वक्ष्यति तत्त्वं ब्रूयात् दुरधीयानन्तं वै भवान् मौद्गल्यमवोचत् स त्वा यं प्रश्नमप्राक्षीन्न तं व्यवोचः पुरा संवत्सरादार्त्तिमाकृष्यसीति ॥ ६ ॥ हे सोम्य! यदि वे अज्ञानी होंगे, तो कहेंगे कि आचार्य अपने बालब्रह्मचारी और ब्रह्मचारियों को जिसका उद्बोधन देते हैं, वह सावित्री है। तुम कहना आपने उन मौद्गल्य को अज्ञानी कहा था, वे आपसे एक प्रश्न पूछेंगे, यदि उसे आपने नहीं बताया, तो आपको एक वर्ष तक भारी पीड़ा सहनी होगी ॥ ६ ॥ ॥ द्वितीया कण्डिका ॥ स ह मौद्गल्यः स्वमन्तेवासिनमुवाच, परेहि सौम्य ग्लावं मैत्रेयमुपसीदाधीहि भोः सावित्रीं गायत्रीञ्चतुर्विंशतियोनिं द्वादशमिथुनां यस्या भृग्वङ्गिरसश्चक्षुर्यस्यां सर्वमिदं श्रितम् ॥ १ ॥ तदनन्तर मौद्गल्य ऋषि ने अपने शिष्य से कहा- हे सोम्य! तुम ग्लाव मैत्रेय के पास जाओ और कहो- हे आचार्य! चौबीस सूक्ष्म केन्द्रों वाली, बारह जोड़ों वाली सावित्री-गायत्री के सम्बन्ध में बताएँ, जिसके भृगु-आङ्गिरस (ज्ञान की विशिष्ट धाराएँ) नेत्र हैं, जिसमें यह सब आश्रित हैं, आप उस गायत्री का हमें उपदेश करें ॥ १ ॥ स तत्राजगाम यत्रेत्तरो बभूव, तं ह पप्रच्छ स ह न प्रतिपेदे, तं होवाच दुरधीयानंतं वै भवान् मौद्गल्यमवोचत् स त्वा यं प्रश्नमप्राक्षीन्न तं व्यवोचः पुरासंवत्सरादार्त्तिमाकृष्यसीति ॥ २ ॥ वह (मौद्गल्य का शिष्य) वहाँ पहुँचा, जहाँ मैत्रेय का आश्रम था। उसने उनसे (मैत्रेय से) पूछा; किन्तु वे उस प्रश्न का उत्तर न दे सके। तदनन्तर उसने उनसे कहा- भगवन्! आपने मौद्गल्य को अज्ञानी बताया था। उन्होंने आपसे प्रश्न पूछा और आप न बता सके, सो आपको एक वर्ष तक पीड़ा सहनी होगी ॥ २ ॥ स ह मैत्रेयः स्वानन्तेवासिन उवाच यथार्थं भवन्तो यथागृहं यथामनो विप्रसृज्यन्तां दुरधीयानं वा अहं मौद्गल्यमवोचं स मा यं प्रश्नमप्राक्षीन्न तं व्यवोचं तमुपैष्यामि शान्तिं करिष्यामीति ॥ ३ ॥ उन मैत्रेय ऋषि ने अपने शिष्यों से यथार्थपूर्वक कहा- आप लोग अपने घर को इच्छानुसार प्रस्थान करें। मैंने मौद्गल्य को अयोग्य बताया था, उन्होंने मुझसे जो प्रश्न पूछा है, वह मैं नहीं बता सका। अब मैं उनके पास जाऊँगा और उन्हें शान्ति (सन्तुष्टि) प्रदान करूँगा ॥ ३ ॥
खण्ड २ मन्त्र ८ ७७ स ह मैत्रेयः प्रातः समित्पाणिर्मौद्गल्यमुपससादासावाग्रहं भो मैत्रेयः किमर्थमिति दुरधीयानं वा अहं भवन्तमवोचं त्वं मा यम्पृश्रमप्राक्षीन्नं तं व्यवोचं त्वामुपेव्यामि शान्तिं करिष्यामीति ॥ ४ ॥ वे हाथ में समिधा लिये प्रातःकाल ज्ञान के आग्रह के साथ मौद्गल्य के पास पहुँचे और बोले - हे आचार्य ! मैं मैत्रेय हूँ। मौद्गल्य ने पूछा- कैसे आगमन हुआ ? (मैत्रेय) मैंने आपको अयोग्य बताया था। आपने मुझसे जो प्रश्न पूछा था, वह मैं नहीं बता पाया। अब मैं आपके पास सेवा में उपस्थित होकर आपको सन्तुष्ट करूँगा ॥ ४ ॥ स होवाचात्र वा उपेतञ्च सर्वञ्च कृतं पापकेन त्वा यानेन चरन्तमाहूरथोऽयं मम कल्याणस्तंते ददामि तेन याहीति ॥ ५ ॥ मौद्गल्य ऋषि ने कहा- आप यहाँ आये हैं। लोग कहते हैं कि आप शुद्ध भाव से नहीं आये हैं; तो भी मैं आपको कल्याणकारी भावों का रथ देता हूँ, इसी से चलें ॥ ५ ॥ [ रथ का अर्थ होता है संवाहक ( कैरियर )- जो लक्ष्य तक पहुँचाये। मनुष्य अपने भावों के अनुरूप ही जीवन की गति प्राप्त करता है। कल्याण चाहने वालों को कल्याणकारी भावों का ही आश्रय लेना होता है।] स होवाचैतदेवात्रात्विषञ्चानृशंस्यञ्च यथा भवानाहोपायामित्येवं भवन्तमिति तं होपेयाय तं होपेत्य पप्रच्छ किंस्विदाहुर्भोः सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयः किमाहुर्धियो विचक्ष्व यदि ताः प्रवेक्ष्य प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति ॥ ६ ॥ मैत्रेय ऋषि ने कहा- आपका वचन अभयकारी और सत्य है। जैसा आप कहते हैं, वैसा ही करने के लिए मैं आपके पास उपस्थित हूँ। वे मौद्गल्य ऋषि के पास विधिपूर्वक उपस्थित हुए और पास आकर पूछने लगे- हे आचार्य ! सविता का वरणीय तत्त्व क्या है ? उस देव का भर्ग क्या है ? इसका उत्तर क्रान्तदर्शी क्या बताते हैं ? धी संज्ञक तत्त्व की व्याख्या क्या करते हैं, जिन्हें प्रेरित करता हुआ वह देव द्युलोक में प्रविष्ट होकर विचरण करता है ? ॥ ६ ॥ तस्मा एतत् प्रोवाच वेदाश्छन्दांसि सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयोऽन्नमाहुः । कर्माणि धियस्तदु ते ब्रवीमि प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति ॥ ७ ॥ उन मैत्रेय से मौद्गल्य ऋषि ने कहा- वैदिक छन्द सविता के वरणीय तत्त्व हैं। मेधावी पुरुष अन्न को ही उस देव का भर्ग बताते हैं। कर्म ही वह धी तत्त्व है, जिन्हें प्रेरित करता हुआ वह देव गमन करता है ॥ ७ ॥ [ सविता-सर्व प्रेरक है। छन्दों में जो उसके प्रेरक तत्त्व प्रकट हुए हैं, वे ही वरणीय हैं, अन्य अव्यक्त प्रवाह मनुष्य की ग्रहण शक्ति के परे होने से वरणीय नहीं हैं। धी बुद्धि को कहते हैं। सविता देव कर्म प्रेरक बुद्धि युक्त होकर विचरण करते हैं, ऐसा ऋषि का भाव प्रतीत होता है।] तमुपसंगृह्य पप्रच्छाधीहि भोः कः सविता का सावित्री ॥ ८ ॥ उसे सुनकर मैत्रेय ने मौद्गल्य से आदरपूर्वक पूछा- हे आचार्य ! हमें बताएँ, सविता क्या है और सावित्री क्या है ? ॥ ८ ॥
७८ गायत्र्युपनिषद् ॥ तृतीया कण्डिका ॥ मन एव सविता, वाक् सावित्री, यत्र ह्येव मनस्तद् वाक्, यत्र वै वाक् तन्मन इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ १ ॥ मौद्गल्य ऋषि ने कहा- मन ही सविता (प्रेरक तत्त्व) और वाणी सावित्री (प्रेरित तत्त्व) है। जहाँ पर मन है, वहाँ वाणी है, जहाँ वाणी है; वहाँ मन है। ये दो एक युग्म हैं, योनि (उत्पादक केन्द्र) रूप हैं॥ अग्नेिरेव सविता, पृथिवी सावित्री यत्र ह्येवाग्निस्तत्पृथिवी यत्र वे पृथिवी तदग्निरित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ २ ॥ अग्नि ही सविता है और पृथ्वी सावित्री है। जहाँ पर अग्नि है, वहाँ पृथ्वी है, जहाँ पृथ्वी है; वहाँ अग्नि है। ये दो (अग्नि और पृथ्वी) एक जोड़ा हैं, योनिरूप हैं॥ २ ॥ वायुरेव सविताऽन्तरिक्षं सावित्री यत्र ह्येव वायुस्तदन्तरिक्षं, यत्र वा अन्तरिक्षं तद्वायुरित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ३ ॥ वायु ही सविता है और अन्तरिक्ष सावित्री है। जहाँ पर वायु है, वहाँ अन्तरिक्ष है; जहाँ अन्तरिक्ष है, वहाँ वायु है। ये दो (वायु और अन्तरिक्ष) एक युग्म और उत्पादक केन्द्र हैं॥ ३ ॥ आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री यत्र ह्येवादित्यस्तद्द्यौर्यत्र वै द्यौस्तदादित्य इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ४ ॥ आदित्य ही सविता है और द्युलोक सावित्री है। जहाँ पर आदित्य है, वहाँ द्यौ है; जहाँ द्यौ है, वहाँ आदित्य है। ये दोनों (द्यौ और आदित्य) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ४ ॥ चन्द्रमा एव सविता, नक्षत्राणि सावित्री, यत्र ह्येव चन्द्रमास्तन्नक्षत्राणि यत्र वै नक्षत्राणि तच्चन्द्रमा, इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ५ ॥ चन्द्रमा ही सविता है और नक्षत्र सावित्री है। जहाँ चन्द्रमा है, वहाँ नक्षत्र है तथा जहाँ नक्षत्र है, वहाँ चन्द्रमा है। ये दोनों (चन्द्रमा और नक्षत्र) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ५ ॥ अहुरेव सविता, रात्रिः सावित्री, यत्र ह्येवाहस्तद्रानिर्यत्र वै रात्रिस्तदहरित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ६ ॥ दिन ही सविता है और रात्रि सावित्री है। जहाँ पर दिन है, वहाँ रात्रि है; जहाँ रात्रि है, वहाँ दिन है। ये दो (दिन और रात्रि) उत्पत्ति केन्द्र हैं, एक जोड़ा हैं॥ ६ ॥ उष्णामेव सविता, शीतं सावित्री, यत्र ह्येवोष्णं, तच्छीतं, यत्र वै शीतं तदुष्णमित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ७ ॥ उष्णता ही सविता है और शीत सावित्री है। जहाँ उष्णता है, वहाँ शीत है; जहाँ शीत है, वहा उष्णता है। ये दोनों (उष्णता और शीत) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ७ ॥ अब्भ्रमेव सविता वर्ष सावित्री यत्र ह्येवाब्भ्रन्तद्वर्षं यत्र वै वर्षं तदब्भ्रमित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ८ ॥
खण्ड ४ मन्त्र १ ७९ मेघ ही सविता है और वर्षण सावित्री है। जहाँ पर मेघ है, वहाँ वर्षण है; जहाँ वर्षण है, वहाँ मेघ है। ये दोनों (मेघ और वर्षण) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ८ ॥ विद्युदेव सविता स्तनयित्नुः सावित्री यत्र ह्येव विद्युत् तत् स्तनयित्नुः यत्र वै स्तनयित्नुस्तद्विद्युदित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ९ ॥ विद्युत् ही सविता है और उसकी तड़क सावित्री है। जहाँ पर विद्युत् है, वहाँ तड़क है जहाँ पर तड़क है, वहाँ विद्युत् है। ये दोनों (विद्युत् और तड़क) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ९ ॥ प्राण एव सविता अन्नं सावित्री, यत्र ह्येव प्राणस्तदन्नं यत्र वा अन्नं तत् प्राण इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ १० ॥ प्राण सविता है और अन्न सावित्री है। जहाँ पर प्राण है, वहाँ अन्न है; जहाँ अन्न है, वहाँ प्राण है। ये दोनों (प्राण और अन्न) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ १०॥ वेदा एव सविता छन्दांसि सावित्री, यत्र ह्येव वेदास्तच्छन्दांसि यत्र वै छन्दांसि तद् वेदा इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ११॥ वेद ही सविता है और छन्द सावित्री है। जहाँ वेद हैं, वहाँ छन्द हैं, जहाँ छन्द हैं, वहाँ वेद हैं। दोनों (वेद और छन्द) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ११॥ यज्ञ एव सविता दक्षिणा सावित्री, यत्र ह्येव यज्ञस्तत् दक्षिणा यत्र वै दक्षिणास्तद्यज्ञ इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ १२ ॥ यज्ञ ही सविता है और दक्षिणा सावित्री। जहाँ यज्ञ है, वहाँ दक्षिणा है और जहाँ दक्षिणा है, वहाँ यज्ञ है। ये दोनों (यज्ञ और दक्षिणा) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ १२ ॥ एतद्ध स्मैतद्विद्वांसमोपाकारिमासस्तुर्ब्रह्मचारी ते संस्थित इत्यथैत आसस्तुराचित इव चितो बभूवाथोत्थाय प्राव्राजीदित्येतद्वाऽहं वेद नैतासु योनिश्वित एतेभ्यो वा मिथुनेभ्यः सम्भूतो ब्रह्मचारी मम पुरायुषः प्रेयादिति ॥ १३ ॥ (तदनन्तर ग्लाव मैत्रेय ने मौद्गल्य से कहा) हे विद्वान् आचार्य ! आपके द्वारा मैं उपकृत हुआ हूँ। यह ब्रह्मचारी आपकी सेवा में (दक्षिणा हेतु) उपस्थित है। यह ब्रह्मचारी आपके यहाँ आकर ज्ञान से परिपूर्ण हो गया है। ऐसा कहकर वे (मैत्रेय) वहाँ से उठकर टहलते हुए बोले- अब मैं यह जान गया हूँ, इन जोड़ों तथा उत्पत्ति केन्द्रों से जुड़ा मेरा ब्रह्मचारी अल्पायु नहीं होगा॥ १३ ॥ ॥ चतुर्थी कण्डिका ॥ ब्रह्म हेदं श्रियं प्रतिष्ठामायतनमैक्षत तत्तपस्व यदि तद् व्रते ध्रियेत तत्सत्ये प्रत्यतिष्ठत् ॥ १॥ मौद्गल्य ने मैत्रेय से कहा- यह ब्रह्म ही श्रीरूप, प्रतिष्ठा रूप और आश्रयरूप है, इसलिए आप तप करें। यदि तपः-व्रत को धारण किया जाए, तो सत्य में प्रतिष्ठा होती है॥ १॥
८० गायत्रीउपनिषद् स सविता सावित्र्या ब्राह्मणं सृष्ट्वा तत् सावित्रीं पर्यदधात् तत् सवितुर्वरेण्यमिति सावित्र्याः प्रथमः पादः ॥ २ ॥ उन देव सविता ने सावित्री के साथ ब्राह्मण (ब्रह्मज्ञान सम्पन्न) को उत्पन्न कर उसे सावित्री (मन्त्र) को धारण कराया- तत्सवितुर्वरेण्यं- यह सावित्री का पहला चरण है॥ २॥ पृथिव्यर्चं समदधादृचाऽग्निमग्निना श्रियं श्रिया स्त्रियं स्त्रिया मिथुनं मिथुनेन प्रजां प्रजया कर्म कर्मणा तपस्तपसा सत्यं सत्येन ब्रह्म ब्रह्मणा ब्राह्मणं ब्राह्मणेन व्रतं व्रतेन वै ब्राह्मणः संशितोभवत्यशून्यो भवत्यविच्छिन्नः ॥ ३ ॥ (देव सविता ने) पृथ्वी के साथ ऋक् को संयुक्त किया। ऋक् से अग्नि को, अग्नि से श्री को, श्री से स्त्री को, स्त्री से जोड़े को, जोड़े के साथ प्रजा को, प्रजा से कर्म को, कर्म से तप को, तप से सत्य को सत्य से ब्रह्म (वेदज्ञान) को, ब्रह्म (वेदज्ञान) से ब्राह्मण को, ब्राह्मण से व्रत को संयुक्त किया। व्रत से ही वह ब्राह्मण तेजस्वी होता है, परिपूर्ण होता है और अविच्छिन्न होता है ॥ ३ ॥ भवत्यविच्छिन्नोऽस्य तन्तुरविच्छिन्नं जीवनं भवनं भवति य एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेतं सावित्र्याः प्रथमं पादं व्याचष्टे ॥ ४ ॥ जो विद्वान् इस प्रकार सावित्री के प्रथम चरण (वरण करने योग्य) को जानता है और जानकर इस प्रकार व्याख्या करता है, उसका वंश और उसका जीवन अविच्छिन्न होता है ॥ ४ ॥ ॥ पञ्चमी कण्डिका ॥ भर्गो देवस्य धीमहीति सावित्र्या द्वितीयः पादोऽन्तरिक्षेण यजुः समदधात् यजुषा वायुं, वायुनाऽभ्रमभ्रेण वर्षं, वर्षेणौषधिवनस्पतीनौषधि वनस्पतिभिः पशून् पशुभिः कर्म कर्मणा तपस्तपसा सत्यं, सत्येन ब्रह्म, ब्रह्मणा ब्राह्मणं, ब्राह्मणेन व्रतं व्रतेन वै ब्राह्मणः संशितो भवत्यशून्यो भवत्यविच्छिन्नः ॥ १ ॥ 'भर्गो देवस्य धीमहि' - यह सावित्री का द्वितीय चरण है। देव सविता ने अन्तरिक्ष के साथ यजुष् को संयुक्त किया। यजुष् के साथ वायु को, वायु के साथ मेघ को, मेघ के साथ वर्षा को, वर्षा के साथ ओषधियों एवं वनस्पतियों को, ओषधियों एवं वनस्पतियों के साथ पशुओं को, पशुओं के साथ कर्म को, कर्म के साथ तप को, तप के साथ सत्य को, सत्य के साथ ब्रह्म (वेदज्ञान) को, ब्रह्म (वेदज्ञान) से ब्राह्मण को, ब्राह्मण से व्रत को संयुक्त किया। व्रत से ही ब्राह्मण तेजस्वी, परिपूर्ण और अविच्छिन्न होता है॥ १॥ भवत्यविच्छिन्नोऽस्य तन्तुरविच्छिन्नं जीवनं भवति य एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेतं सावित्र्या द्वितीयं पादं व्याचष्टे ॥ २ ॥ जो विद्वान् इस प्रकार सावित्री के द्वितीय चरण (धारण किये जाने वाले भर्ग तत्त्व) को जानता है और इस प्रकार व्याख्या करता है, उसका वंश और उसका जीवन अविच्छिन्न होता है ॥ २ ॥
॥ षष्ठ काण्डका ॥
॥ षष्ठ काण्डका ॥ धियो यो नः प्रचोदयादिति सावित्र्यास्तृतीयः पादो दिवा साम समदधात्सा- म्नाऽऽदित्यमादित्येनरश्मीन् रश्मिभिर्वर्षं, वर्षेणौषधिवनस्पती-नोषधिवनस्पतिभिः पशून् पशुभिः कर्म कर्मणा तपस्तपसा सत्यं सत्येन ब्रह्म, ब्रह्मणा ब्राह्मणेन व्रतं व्रतेन वै ब्राह्मणः संशितो भवत्यशून्याभवत्यविच्छिन्नः ॥ १ ॥ 'धियो यो नः प्रचोदयात्'- यह सावित्री का तृतीय चरण है। उन देव सविता ने द्युलोक के साथ साम को संयुक्त किया। साम के साथ आदित्य को, आदित्य के साथ रश्मियों को, रश्मियों के साथ वर्षा को, वर्षा के साथ ओषधियों एवं वनस्पतियों को, ओषधियों एवं वनस्पतियों के साथ पशुओं को, पशुओं के साथ कर्म को, कर्म के साथ तप को, तप के साथ सत्य को, सत्य के साथ ब्रह्म को, ब्रह्म के साथ ब्राह्मण को, ब्राह्मण के साथ व्रत को संयुक्त किया। व्रत से ही ब्राह्मण तेजस्वी, परिपूर्ण और अविच्छिन्न होता है ॥ १ ॥ भवत्यविच्छिन्नोऽस्य तन्तुरविच्छिन्नं जीवनं भवति य एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेतं सावित्र्यास्तृतीयं पादं व्याचष्टे ॥ २ ॥ जो विद्वान् इस प्रकार सावित्री के तृतीय चरण (प्रेरणा प्रदायक) को जानता है और उसे जानकर उसकी व्याख्या करता है, उसका वंश और उसका जीवन अविच्छिन्न रहता है ॥ २ ॥ ॥ सप्तमी कण्डिका ॥ तेन ह वा एवं विदुषा ब्राह्मणेन ब्रह्माभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टम् ॥ १ ॥ उस विद्वान् (सावित्री के तीनों चरणों के जानकार) ब्राह्मण द्वारा वह ब्राह्मी (शक्ति) प्राप्त, ग्रसित (धारित) तथा परामृष्ट (सम्बद्ध-अनुभूति पूर्वक प्रयुक्त) होती है ॥ १ ॥ ब्रह्मणाऽऽकाशमभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टमाकाशेन वायुरभिपन्नो ग्रसितः परामृष्टो वायुना ज्योतिरभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टं ज्योतिषाऽपोऽभिपन्ना ग्रसिताः परामृष्टा अद्भिर्भूमिर्अभिपन्ना ग्रसिता परामृष्टा भूम्याऽन्नमभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टमन्नेन प्राणोऽभिपन्नो ग्रसितः परामृष्टः प्राणेन मनोऽभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टं मनसा वागभिपन्ना ग्रसिता परामृष्टा वाचा वेदा अभिपन्ना ग्रसिताः परामृष्टा वेदैर्यज्ञोऽभिपन्नो ग्रसितः परामृष्टस्तानि ह वा एतानि द्वादशमहाभूतान्येवं विधिप्रतिष्ठितानि तेषां यज्ञ एव परार्द्धः ॥ २ ॥ ब्रह्म के साथ आकाश प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट (सम्बद्ध) है। आकाश के साथ वायु प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट (सम्बद्ध) है। वायु के साथ ज्योति प्राप्त, ग्रसित और परामृष्ट (सम्बद्ध) है, ज्योति के साथ जल प्राप्त, ग्रसित और परामृष्ट है। जल के साथ पृथ्वी प्राप्त, ग्रसित और परामृष्ट है। पृथ्वी के साथ अन्न प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट है। अन्न के साथ प्राण प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट है। प्राण के साथ मन प्राप्त, ग्रसित एवं
६२ गायत्र्युपनिषद् परामृष्ट है। मन के साथ वाणी प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट है। वाणी के साथ वेद प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट हैं। वेदों के साथ यज्ञ प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट है। इस प्रकार जानने वाले विद्वान् में से बारह महाभूत प्रतिष्ठित होते हैं। उनमें यज्ञ ही सर्वश्रेष्ठ है ॥२॥ ॥ अष्टमी कण्डिका ॥ तं ह स्मैतमेवं विद्वांसो मन्यन्ते विद्वानमिति याथातथ्यमविद्वांसोऽयं यज्ञो वेदेषु प्रतिष्ठितो वेदा वाचि प्रतिष्ठिता वाङ् मनसि प्रतिष्ठिता मनः प्राणे प्रतिष्ठितं प्राणोऽन्ने प्रतिष्ठितो ऽन्नं भूमौ प्रतिष्ठितं भूमिरप्सु प्रतिष्ठितो आपो ज्योतिषि प्रतिष्ठिता ज्योतिर्वायौ प्रतिष्ठितं वायुराकाशे प्रतिष्ठित आकाशं ब्रह्मणि प्रतिष्ठितं ब्रह्म ब्राह्मणे ब्रह्मविदि प्रतिष्ठितं यो ह वा एवं वित् स ब्रह्मवित् पुण्यां च कीर्तिं लभते सुरभींश्च गन्धान् सोऽपहतपाप्मानन्तां श्रियमश्रुते य एवं वेद, यश्चैवं विद्वानेवमेतां वेदानां मातरं सावित्रीसम्पदमुपनिषदमुपास्त इति ब्राह्मणम् ॥ १ ॥ जो विद्वान् यह मानते हैं कि हम यज्ञ जानते हैं - यथार्थ में वे अज्ञानी हैं। यह यज्ञ वेदों में प्रतिष्ठित है। वेद वाणी में प्रतिष्ठित है। वाणी मन में प्रतिष्ठित है। मन प्राण में प्रतिष्ठित है। प्राण अन्न में प्रतिष्ठित है। अन्न भूमि में प्रतिष्ठित है। भूमि जल में प्रतिष्ठित है। जल तेज (अग्नि) में प्रतिष्ठित है। तेज वायु में प्रतिष्ठित है। वायु आकाश में प्रतिष्ठित है। आकाश ब्रह्म में प्रतिष्ठित है। ब्रह्म ब्राह्मण (ब्रह्मज्ञानी) में प्रतिष्ठित है। इस प्रकार (बारहों महाभूतों की गति को) जानने वाला ब्रह्मज्ञानी पुरुष पुण्य एवं कीर्ति को प्राप्त करता है, सुरभित गन्धादि युक्त जीवन प्राप्त करता है। वह पापों से मुक्त होकर विराट् ऐश्वर्य को ग्रहण करता है ॥१॥ ॥ इति गायत्री उपनिषत्समाप्ता ॥
॥ छान्दोग्योपनिषद् ॥ सामवेद की तलवकार शाखा के अन्तर्गत छान्दोग्य ब्राह्मण के अंश को इस उपनिषद् के रूप में मान्यता दी गई है। उक्त ब्राह्मण में १० अध्याय हैं। उसके अन्तिम ८ (आठ) अध्याय उपनिषद् रूप में लिये गये हैं। यह विशाल कलेवर वाले उपनिषदों में से एक है। नाम के अनुरूप इस उपनिषद् का आधार 'छन्दः' है। 'छन्दः' यहाँ साहित्यिक पद्य रचना के प्रकार तक ही सीमित नहीं है, उसका व्यापक अर्थ है। 'छन्दः' का अर्थ है-आच्छादित करने वाला। कवि जिस सत्य का साक्षात्कार करता है, वह सत्य, वह भाव हृदयंगम करने के लिए वह साहित्यिक छन्द का प्रयोग करता है। वह सत्य या भाव जिन अक्षरों, पदों, स्वरों आदि से आच्छादित होता है, वे सब उस साहित्यिक छन्द के अंगोपांग होते हैं। इसी प्रकार ऋषि इस सृष्टि के मूल सत्य को विभिन्न माध्यमों से व्यक्त होते, प्रकृति के विभिन्न घटकों से आच्छादित हुआ देखता है। अस्तु, उन सबको उन्होंने छन्द या साम या उद्गीथ के रूप में व्यक्त किया है। प्रथम अध्याय में ऋचा, साम आदि के सार रूप ॐकार की व्याख्या की गयी है। देवासुर संग्राम के उपाख्यान से ॐकार-उद्गीथ को केवल स्वर-श्वास आदि तक ही सीमित न रखकर उसे मुख्य प्राणों के स्पन्दन से जोड़ने का रहस्य समझाया है। फिर ॐकार की आध्यात्मिक, आधिदैविक उपासनाएँ समझाते हुए विभिन्न स्वरूप स्पष्ट किये गये हैं। दूसरे अध्याय में 'साम' को साधुता-श्रेष्ठता से जोड़ते हुए विभिन्न प्रकार की उपासनाओं का वर्णन किया गया है। तीसरे अध्याय में आदित्य को देवों का मधु कहकर उसकी विभिन्न दिशाओं से विभिन्न प्रकार के अमृर्तों की उपलब्धि का वर्णन है। इस मधुविद्या के अधिकारियों का उल्लेख करते हुए गायत्री की सर्वरूपता सिद्ध करके आदित्य की ब्रह्मरूप में उपासना का निर्देश दिया गया है। चौथे अध्याय में सत्यकाम जाबाल का वृषभ, अग्नि, हंस एवं मद्ग द्वारा ब्रह्म बोध कराये जाने का तथा उपकौशल को विभिन्न अग्नियों द्वारा शिक्षित किए जाने का उपाख्यान है। पाँचवाँ अध्याय प्राण विद्या परक है। श्वेतकेतु एवं प्रवाहण संवाद में अप्तत्त्व का पाँचवीं आहुति में व्यक्तिवाचक बन जाने तथा अश्वपति एवं ऋषियों के संवाद से प्राण की विभिन्न प्रकृतियों का उल्लेख है। छठवें अध्याय में ईश्वर एवं आत्मा के विभिन्न स्वरूपों को विभिन्न दृष्टान्तों से स्पष्ट किया गया है। सातवें अध्याय में ब्रह्म की विभिन्न रूपों में उपासना समझायी गई है। आठवें अध्याय में इन्द्र एवं विरोचन के कथानक द्वारा आत्मतत्त्व और ब्रह्मतत्त्व के साक्षात्कार के लिए तप द्वारा पात्रता अर्जित करने का महत्त्व दर्शाया गया है। अन्त में आत्मज्ञान की परम्परा एवं उसके फल का वर्णन है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ आप्यायन्तु..... इति शान्तिः (द्रष्टव्य- केनोपनिषद्) ॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत, ओमिति ह्युद्गायति तस्योपाख्यानम् ॥ १ ॥ 'ॐ' इस अक्षर का यज्ञ में उद्गाता द्वारा सर्वप्रथम उच्चारण किया जाता है। ॐ का उच्चारण करके उद्गाता सामगान करता है। उसी उद्गीथ साधना की यहाँ व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥ एषां भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपो रसोऽपामोषधयो रस ओषधीनां पुरुषो रसः पुरुषस्य वाग्रसो वाच ऋग्रस ऋचः साम रसः साम्न उद्गीथो रसः ॥ २ ॥
८४ छान्दोग्यापनिषद सम्पूर्ण प्राणियों अथवा पदार्थों का रस (सार) पृथिवी है। पृथिवी का रस (सारभाग) जल है, जल का रस ओषधियाँ हैं, ओषधियों का रस पुरुष है। पुरुष का रस वाक् है। वाणी का रस साम है। साम का रस उद्गीथ ॐकार है॥ २॥ स एष रसानाꣳ रसतमः परमः पराध्योऽष्टमो य उद्गीथः ॥ ३ ॥ यह ॐकार सभी रसों में सर्वोत्तम रस है। यह परमात्मा का प्रतीक होने के कारण उपास्य है। यह पृथिवी आदि रसों में आठवाँ है॥ ३॥ [ रसों में आठवाँ होने का अपना महत्त्व है। यह सृष्टि सात-सात के वर्गों में विभक्त है, सप्तलोक, सप्तराग, सप्तरंग, सप्तव्याहृतियाँ आदि। आठवाँ पिछले सप्तक का समापक तथा नये सप्तक का प्रारंभिक होता है। ॐ में सभी रस समाहित भी होते हैं तथा उसी से सब प्रकट भी होते हैं, गूढ़ार्थ में आठवाँ कहने का यही भाव प्रतीत होता है।] कतमा कतमर्कतमत्कतमत्साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति ॥४॥ अब यह विचार किया जाता है कि कौन-कौन सा ऋक् है, कौन सा साम है और कौन सा उद्गीथ है॥ वागेवर्क् प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथस्तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्चर्क् च साम च॥ वाक् ही ऋक् है, प्राण ही साम है और ॐकार ही उद्गीथ है। जो ऋक् रूप वाणी और सामरूप प्राण है, ये (मिथुन) जोड़े प्रसिद्ध हैं॥ ५॥ [ प्राण ही साम है। सामगान केवल वाणी की कलाकारिता नहीं है, उसमें वाणी के साथ प्राण का स्पन्दन भी जुड़ा होना चाहिए। यदि प्राण में अन्तः स्फूर्त तरंगें नहीं उठतीं, तो साम गान नहीं बन पाता। सामान्य गायन की प्रभावोत्पादकता में भी यही तथ्य कार्य करता है।] तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे सꣳसृज्यते यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य कामम्॥ ६ ॥ जिस प्रकार मिथुन (स्त्री-पुरुष) का मिलन एक दूसरे की कामनाओं की पूर्ति करता है, उसी प्रकार इस (वाणी और प्राण अथवा ऋचा और साम के) जोड़े के संयोग से ॐकार का संसृजन होता है॥ ६ ॥ आपयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ७ ॥ जो विद्वान् उद्गीथ रूप ॐकार की उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओं की प्राप्ति कराने वाला होता है॥ तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि किंचानुजानात्योमित्येव तदाह एषा एव समृद्धिर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ८ ॥ यह ॐकार अनुमति सूचक है। जब कोई किसी को अनुमति देता है, तो ॐकार कहकर उसे प्रकट करता है। यह अनुमति ही समृद्धिप्रद है। यह जानने वाला जो विद्वान् ॐकार की उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति करने वाला होता है॥ ८॥ [ यह सृष्टि ब्रह्म के संकल्प से बनी है। सृष्टि उत्पादन के पीछे उसकी अनुमति, सृष्टि सृजन की संमति ही मूल कारण है। जिस ऋद्धि-सिद्धि या साधन के लिए ब्रह्म की अनुमति हो जाती है, वही तत्त्व अस्तित्व में आ जाता है। अस्तु, ब्रह्म की अनुमति ही समृद्धि है, ऋषि का यह कथन बहुत मर्मयुक्त है।] तेनेयं त्रयी विद्या वर्तत ओमित्याश्रावयत्योमिति शꣳसत्योमित्युद्गायत्ये- तस्यैवाक्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन ॥ ९ ॥ ॐ अक्षर से ही त्रयी (वेदत्रयी अथवा त्रिगुणात्मिका सृष्टि की) विद्या (यज्ञादि या सृष्टि सृजन) कर्म में प्रवृत्त होती है। ॐ कहकर ही अध्वर्यु आश्रावण (आदेश) कर्म करता है। ॐ कहकर ही होता शंसन
अध्याय १ खण्ड २ मन्त्र ५ ८५
अध्याय १ खण्ड २ मन्त्र ५ ८५
(पाठ या स्तुति) करता है और उद्गाता सामगान आरम्भ करता है। इसी ॐकार अक्षर रूप ब्रह्म की महिमा और रस(हव्य) से सभी यज्ञादि कर्म उसी अक्षर (ब्रह्म) की अर्चना के लिए सम्पन्न किये जाते हैं ॥ तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद। नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति ॥ १० ॥ जो उस (अक्षर ब्रह्म) को जानता है और जो नहीं जानता, वे दोनों ही उसी के माध्यम से कर्म करते हैं। विद्या और अविद्या (युक्तकर्म) के भिन्न-भिन्न फल हैं। जो कर्म विद्या , श्रद्धा और उपासना से युक्त होकर किया जाता है, वही अधिक शक्तिशाली होता है। यह उस अक्षर ब्रह्म की ही व्याख्या है ॥ १० ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ देवासुरा ह वै यत्र संयेतिर उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैना- नभिभविष्याम इति ॥ १ ॥ प्रजापति की दोनों सन्तानें-देवगण और असुरगण परस्पर युद्ध करने लगे, तो देवों ने विचार किया कि हम उद्गीथ की उपासना करके असुरों का पराभव करेंगे ॥ १ ॥ [ परमात्मा को प्रजा-सृष्टि का जनक तथा स्वामी-पति कहा गया है। उसी से देव-असुर, पदार्थ-प्रति पदार्थ (मैटर-एन्टी मैटर) सर्जक और मारक प्रवाह सत्प्रवृत्ति-दुष्प्रवृत्ति आदि की उत्पत्ति हुई, वही उसका स्वामी है। यदि ये एक हो जायें, तो पुनः वह निश्चेष्ट सृष्टि के पूर्व की स्थिति बन जाये। इसीलिए वे दोनों पक्ष अपने - अपने निर्धारित पुरुषार्थ में प्रवृत्त रहते हैं। मनुष्य अपने संकल्प से किसी भी प्रवाह को फलित कर सकता है। आसुरी प्रभाव से बचने के लिए उद्गीथ साधना का विधान बतलाया गया है।] ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासांचक्रिरे। तंहासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥ उन्होंने (देवों ने) नासिका स्थित प्राण के रूप में उद्गीथ की उपासना की, किन्तु असुरों ने उस प्राण को अपने पाप से भ्रष्ट कर दिया। पाप से बींधने के कारण ही वह (घ्राण) सुगन्ध एवं दुर्गन्ध दोनों को ग्रहण करता है ॥ २ ॥ अथ ह वाचमुद्गीथमुपासांचक्रिरे। तांहासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तयोभयं वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥ फिर देवों ने वाणी के रूप में उद्गीथ (ॐकार) की उपासना की; किन्तु असुरों ने अपने पाप से वाणी को भ्रष्ट कर दिया। पाप से बींधे जाने के कारण वाणी सत्य और झूठ दोनों बोलने लगी ॥ ३ ॥ अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासांचक्रिरे। तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ४ ॥ फिर देवों ने चक्षु रूप ॐकार की उपासना की; किन्तु असुरों ने अपने पाप से उसे भी भ्रष्ट कर दिया। पाप से बींधे जाने के कारण नेत्र देखने योग्य और न देखने योग्य दोनों को देखता है ॥ ४ ॥ अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासांचक्रिरे। तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयꣳ शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ५ ॥ फिर देवों ने श्रोत्ररूप ॐकार की उपासना की, तब असुरों ने अपने पाप से उसे भ्रष्ट कर दिया, पाप से बींधे जाने के कारण श्रोत्र सुनने योग्य और न सुनने योग्य सभी बातों को सुनता है ॥ ५ ॥
८६ छाान्दोग्यापनिषद् अथ ह मन उद्गीथमुपासांचक्रिरे। तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयः संकल्पयते संकल्पनीयं चासंकल्पनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम्॥ ६॥ फिर देवों ने मन के रूप में ॐकार की उपासना की, तब असुरों ने अपने पाप से उसे भी भ्रष्ट कर दिया, पाप से बाँधे जाने के कारण मन विचारने योग्य और न विचारने योग्य सभी बातों पर विचार करने लगा॥ ६॥ [ यहाँ ऋषि ने यह स्पष्ट किया है कि इन्द्रियों से सम्बद्ध प्राणों से भी उद्गीथ साधना की जा सकती है, किन्तु थोड़ा भी चूकने पर आसुरी प्रवाह उनमें विकार-विक्षेप डाल सकते हैं। आगे समझाया है कि मुख्य प्राण से उद्गीथ साधना करने पर आसुरी प्रपंच असफल हो जाते हैं।] अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे। तंहासुरा ऋत्वा विदध्वंसुर्यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेत ॥ ७॥ फिर देवों ने मुख्य प्राण के रूप में उद्गीथ (ॐकार) की उपासना की, असुरों ने उसे भी पाप युक्त करना चाहा, पर उसके निकट जाकर वे ऐसे ध्वस्त हुए, जैसे कठोर चट्टान से टकराकर मिट्टी का ढेला चूर-चूर हो जाता है ॥ ७॥ एवं यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसत एवः हैव स विध्वंसते य एवंविदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माखणः ॥ ८ ॥ जिस प्रकार अभेद्य चट्टान से टकराकर मिट्टी का ढेला विदीर्ण हो जाता है, उसी प्रकार वह व्यक्ति विनष्ट हो जाता है, जो उद्गीथ (ॐकार) के इस रहस्य को जानने वाले के प्रति पापयुक्त आचरण अथवा दुर्व्यवहार करता है; क्योंकि वह मुख्य प्राण का उपासक अभेद्य चट्टान की तरह दृढ़ होता है॥ ८॥ ॰ नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येष तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान् प्राणानवति। एतमु एवान्ततोऽवित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्त इति ॥ ९॥ इस मुख्य प्राण के द्वारा मनुष्य सुगन्ध या दुर्गन्ध का अनुभव नहीं करता, क्योंकि वह पाप से संयुक्त नहीं है। मनुष्य जो कुछ खाता-पीता है, उसके द्वारा वह समस्त इन्द्रियों के प्राणों को पोषण प्रदान करता है। अन्तकाल में वह प्राण द्वारा अन्न ग्रहण नहीं करता, तो समस्त इन्द्रियों के प्राणों का उत्क्रमण हो जाता है और मुख फटा रह जाता है॥ ९॥ [ शरीरस्थ मुख्य प्राण जब उद्गीथ (उच्च श्रेष्ठ भाव ॐकार) साधना में प्रवृत्त होता है, तो वह आहार को पचाते समय उसके भी उच्च संस्कार को जगा देता है। आहार के माध्यम से इन्द्रिय स्थित प्राणों के पोषण के क्रम में वही उच्च संस्कार उन्हें विकारों के आक्रमण से बचा लेता है। आगे मुख्य प्राण की व्याख्या की गई है।] तंहाङ्गिरा उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसः॥ १०॥ अङ्गिरा ऋषि ने पहले मुख्य प्राण के रूप में ॐकार की ही उपासना की थी। अतः प्राण को “आङ्गिरस” भी कहा गया है, क्योंकि यह सम्पूर्ण अङ्गों का रस अथवा आधार है॥ १०॥ तेन तंह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासांचक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते वाग्घि बृहती तस्या एष पतिः ॥ ११ ॥ इसी प्रकार बृहस्पति देव ने भी उस मुख्य प्राण के रूप में ॐकार की उपासना की, अतः प्राण को बृहस्पति भी कहा गया; क्योंकि वाक् को बृहती कहा गया है और उसके पति (स्वामी) होने से प्राण को बृहस्पति माना गया है॥ ११ ॥
अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र ३ ८७
अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र ३ ८७ तेन तꣳहायास्य उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद्यदयते ॥ १२ ॥ आयास्य ऋषि ने भी प्राण के रूप में ही उद्गीथ की उपासना की थी, अतः मनुष्य इस प्राण को ही आयास्य मानते हैं, क्योंकि यह प्राण आस्य अर्थात् मुख से निष्क्रमण करता है ॥ १२ ॥ तेन तꣳह बको दाल्भ्यो विदांचकार। स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः कामानागायति ॥ १३॥ दल्भ ऋषि के पुत्र बक नामक ऋषि ने प्राण के रूप में उद्गीथ अर्थात् ॐकार की उपासना की । वे ऋषि नैमिषारण्य में यज्ञ करने वाले ऋषियों के उद्गाता हुए। उन्होंने ऋषियों की कामनाओं की पूर्ति के लिए उद्गान किया ॥ १३ ॥ [ जिसने उद्गीथ साधना की है, ऐसे साधक यज्ञादि कार्यों के समक्ष उनके संकल्प के अनुरूप अपने प्राणों को तरंगित करके उसी भाव से पूरे वातावरण को भर देने में समर्थ होते थे।] आगाता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥ १४॥ इस प्रकार इस तथ्य को जानने वाला जो विद्वान् इस अक्षर ब्रह्म ॐकार की उपासना करता है, वह कामनाओं की पूर्ति करने वाला होता है। यह (शरीर की) आध्यात्मिक उपासना का वर्णन है॥ १४॥ ॥ तृतीयः खण्डः ॥ अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन्वा एष प्रजाभ्य उद्गायति उद्यꣳस्तमो भयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥ अब आधिदैविक उपासना का वर्णन करते हैं- तपःशील आदित्य के रूप में उद्गीथ की उपासना करनी चाहिए। यह उदित होकर मनुष्यों के लिए उद्गान अर्थात् प्राणों का संचार करता है। उदित होकर यह अज्ञानरूपी अन्धकार और उससे उत्पन्न होने वाले भय का नाश करता है। जो इस प्रकार जानता है, वह तमस् और सर्वविध भय का नाश करने वाला होता है ॥ १ ॥ [ ईश्वर ने आदित्य को जो प्राण सम्पदा दी है, उसे वह उत्कृष्ट प्रयोजनों के लिए ही प्रकट करता है। उसे आदर्श मानकर अपने प्राणों को गति देने वाला साधक उक्त सिद्धि प्राप्त करता है। ] समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयममुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥ यह प्राण और वह सूर्य दोनों ही समान हैं। यह प्राण उष्ण है और वह सूर्य भी उष्ण है। इस प्राण को स्वर कहते हैं और उस सूर्य को भी स्वर एवं (अस्तकाल में) प्रत्यास्वर कहते हैं। अतः इस प्राण और उस सूर्य रूप में उद्गीथ (ओंकार) की उपासना करनी चाहिए ॥ २ ॥ अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानोऽथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः सा वाक् तस्मादप्राणन्ननपानन्वाच- मभिव्याहरति ॥ ३ ॥ व्यान नामक शरीरस्थ प्राण के रूप में उद्गीथ की उपासना करनी चाहिए। मनुष्य श्वास के द्वारा जो भीतर की वायु बाहर निकालता है, वह प्राण है; और बाहर की वायु जो अन्दर खींचता है, वह अपान है। जो प्राण और अपान की सन्धि है, वह व्यान है। व्यान ही वाणी है। इसीलिए जब मनुष्य बोलता है, तब वह प्राण तथा अपान की क्रिया नहीं करता है ॥ ३ ॥
८८ छान्दोग्योपनिषद्
[ प्राण तत्त्व की प्राण-अपान क्रियाएँ स्वचालित ( आटोमैटिक ) हैं। व्यान में संकल्प पूर्वक प्राण नियोजन दिशा विशेष में होता है। साधना क्रम में प्राण को संकल्प पूर्वक उत् -उच्च आदर्शों की दिशा में तरंगित करना उद्गीथ है। यह क्रिया प्राण एवं अपान क्रियाओं का रोध करके की जाती है। अगले मंत्रों में इस विषय को और भी स्पष्ट किया गया है।]
या वाक्सर्क्तस्मादप्राणन्नपानन्नृचमभिव्याहरति यर्क्तत्साम तस्मादप्राणन्नपानन्साम गायति यत्साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्नपानन्नुद्गायति ॥ ४॥
जो वाणी है, वही ऋक् है। इसलिए मनुष्य श्वास-प्रश्वास की क्रिया न करते हुए भी ऋक् का उच्चारण करता है। जो ऋक् है, वही साम है। इसी से मनुष्य श्वास-प्रश्वास की क्रिया न करते हुए भी सामगान करता है। जो साम है, वही उद्गीथ है। इसीलिए मनुष्य श्वास-प्रश्वास न करते हुए भी उद्गीथ का गान करता है॥
अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्नपानन्स्तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमेवोद्गीथमुपासीत ॥ ५॥
इसके अतिरिक्त जो अन्यान्य पराक्रमयुक्त कर्म हैं, जैसे-अग्नि मन्थन, किसी विशिष्ट लक्ष्य तक दौड़ना, दृढ़ धनुष को खींचना इन सब कर्मों को भी मनुष्य श्वास-प्रश्वास को रोककर ही करता है। अतः व्यान के रूप में ही उद्गीथ की उपासना करना चाहिए ॥ ५॥
अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीतोद्गीथ इति प्राण एवोत्प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग्गीर्वाचो ह गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदं सर्वं स्थितम् ॥ ६ ॥
'उद्गीथ' शब्द के अक्षरों से भी उद्गीथ की उपासना की जाती है। उद्गीथ शब्द में 'उत्' प्राण का पर्याय है, क्योंकि प्राण की शक्ति से प्राणी उठते हैं। वाणी ही 'गी' अक्षर है, क्योंकि वाणी को 'गिरा' कहते हैं। 'थ' अक्षर अन्न है, क्योंकि अन्न के आश्रय से सम्पूर्ण प्राणी स्थित-जीवित हैं ॥ ६ ॥
[ उद्गीथ साधना से शरीर में इन्द्रियों में स्थित अन्न रूप प्राण, कर्म में व्यक्त प्राण ( व्यान ) तथा ऊर्ध्व गति देने वाले मुख्य प्राण तीनों को साधना अनिवार्य है। प्रकृति में भी विभिन्न रूपों में धारक, व्यक्त और उन्नायक प्राण प्रवाहों के संयोग से उद्गीथ साधना का मर्म आगे कहा गया है।]
द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्यः सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीर्ऋग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवान्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्गीथ इति ॥ ७॥
ऊँचा होने से द्यौ ही 'उत्' है, अन्तरिक्ष 'गी' है और पृथिवी 'थ' है। आदित्य ही 'उत्' है, वायु ही 'गी' है और अग्नि ही 'थ' है। सामवेद ही 'उत्' है, यजुर्वेद 'गी' है और सामवेद 'थ' है। जो विद्वान् उद्गीथ के इन अक्षरों के तत्त्व को इस प्रकार जानता है, उसके लिए वाणी वेदों आदि का रहस्य प्रकट कर देती है और वह भोगों को प्राप्त करने वाला तथा भोगने की शक्ति वाला होता है ॥ ७ ॥
आगे यह स्पष्ट किया गया है कि उद्गीथ का साधक सफलता के लिए अपने भावों को एकनिष्ठ रखे। सामगान- स्तुतिगान करने वाले की भाव-साधना, आत्म साधना का स्पष्ट उल्लेख है-
अथ खल्वाशीः समृद्धिरुपसरणीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन्स्यात्तत्सामोपधावेत् ।
अपने अभीष्ट ध्येय की उपासना करनी चाहिए। इससे निश्चयपूर्वक अभीष्ट कामनाओं की समृद्धि प्राप्त होती है। उद्गाता जिस साम के द्वारा उपासना करना चाहता है, वह उसी साम का चिन्तन सर्वदा करे ॥ ८ ॥
अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र ४ ८९
अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र ४ ८९ यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत् ॥ ९ ॥ वह साम जिस ऋचा में हो, उस ऋचा का, उसके ऋषि का तथा उसके देवता का चिन्तन भी उद्गाता को करना चाहिए ॥ ९ ॥ येन च्छन्दसा स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्तꣳस्तोममु- पधावेत् ॥ १० ॥ वह उद्गाता जिस छन्द के द्वारा स्तुति करता हो, उस छन्द का चिन्तन करे। जिन स्तोत्रों से स्तुति करता हो, उन स्तोत्रों का चिन्तन करे ॥ १० ॥ यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेत् ॥ ११ ॥ वह जिस दिशा की स्तुति करता हो, उस दिशा का चिन्तन करे ॥ ११ ॥ आत्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृद्ध्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥ १२ ॥ अन्त में अपने आत्मस्वरूप का और अपनी कामना का चिन्तन करके, वह प्रमादरहित स्तुति करे। जिस कामना की पूर्ति के लिए वह परमात्मा की स्तुति करता है, वह शीघ्र ही अभीष्ट फल प्राप्त करता है ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥ ॐ यह अक्षर ही उद्गीथ है- यह जानकर उपासना करनी चाहिए। उद्गाता यज्ञ में ॐ का उच्चारण करके उद्गान करता है। उस उद्गीथ की ही व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥ देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशꣳस्ते छन्दोभिरच्छादयन्यदेभिर- च्छादयꣳस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ॥ २ ॥ मृत्यु से डरते हुए देवों ने त्रयी विद्या में प्रवेश लिया और अपने को छन्दों से आच्छादित कर लिया। आच्छादित करने वाले होने के कारण वे छन्द कहे गये ॥ २ ॥ [ देवता तो अमर कहे गये हैं, फिर उन्हें मृत्यु का भय कैसे ? यहाँ देवों का तात्पर्य शरीरस्थ देव शक्तियों से है। श्वेताश्वतर उपनिषद् में उल्लेख है कि विराट् पुरुष के अंगों से उत्पन्न देवों ने मनुष्य के अंग-अवयवों में प्रवेश किया। मनुष्य मर्त्य है, उसके अंगों में स्थित देवों को ही मृत्युभय होता है।] तानु तत्र मृत्युर्रथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यदृचि साम्नि यजुषि । ते नु वित्त्वोर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥ ३ ॥ जिस प्रकार मछली पकड़ने वाला धीवर जल के भीतर मछली को देख लेता है, उसी प्रकार ऋक् , साम और यजुष् सम्बन्धी कर्मों में संलग्न देवों को मृत्यु ने देख लिया। देवों को यह बात ज्ञात होने पर वे उन ऋक्, साम और यजुष् सम्बन्धी कर्मों को त्यागकर उस ॐकार अक्षर में ही प्रविष्ट हो गये ॥ ३ ॥ यदा वा ऋचमाप्नोत्योमित्येवातिस्वरत्येवꣳ सामैवं यजुरेष उ स्वरो यदेतदक्षरमे- तदमृतमभयं तत्प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन् ॥ ४ ॥ जब कोई उपासक ऋचा-पाठ करता है, तो वह बड़े आदर के साथ ॐ का उच्चारण करता है। उसी प्रकार साम एवं यजुष् पाठ करने वाले भी ॐ अक्षर का उच्चारण करते हैं। यद्यपि ॐएक स्वर है, तथापि
१० छांदोग्योपनिषद् यह अक्षर, अमृत और अभय रूप ब्रह्म का ही प्रतीक है। देवगण इस अक्षर ब्रह्म ॐकार में प्रविष्ट होकर अमरत्व और अभय को प्राप्त होते हैं ॥ ४ ॥ [ देवगण जब तक नश्वर इन्द्रियादि के रसों में अपना अस्तित्व देखते हैं, तब तक वेदोक्त अनुशासन का पालन करने पर भी मृत्यु भय से मुक्त नहीं होते। जब ॐकार रूप ब्रह्म के सर्वोत्तम रस के आनन्द में प्रवेश करते हैं, तो अमर हो जाते हैं। ] स य एतदेवं विद्वानक्षरं प्रणौत्येतदेवाक्षरꣳ स्वरममृतमभयं प्रविशति तत्प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ ५ ॥ जो ज्ञानी इस अक्षर ब्रह्म ॐ को इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह अमृत और अभयरूप स्वर ब्रह्म ॐ में ही प्रविष्ट करता है। जिस प्रकार इसमें प्रविष्ट होकर देवगण अमरत्व भाव को प्राप्त हुए, उसी प्रकार वह भी अमरत्व को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥ ॥ पञ्चमः खण्डः ॥ अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥ यथार्थ में यह जो उद्गीथ है, वही प्रणव ॐ है और जो प्रणव है, वही उद्गीथ है। यह जो सूर्य है, वही उद्गीथ है, वही प्रणव है, क्योंकि यह गमन करते हुए ॐ का ही उच्चारण करता रहता है ॥ १ ॥ [ अपने पूरे सौर मण्डल को लिए सूर्य भी गतिशील है, यह तथ्य वर्तमान विज्ञान स्वीकार करता है। सूर्य के द्वारा प्राणों के संचार को उद्गीथ (छान्दो.१.३.१ में) पहले ही कहा जा चुका है।] एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच रश्मीꣳस्त्वं पर्यावर्तयाद्बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ कौषीतकि ऋषि ने अपने पुत्र से कहा- मैंने विशेषतः इसी आदित्य को लक्ष्य कर ॐकार का गान किया था, इसी से तू मेरा एक पुत्र है। अब तू यदि सूर्य से विकेन्द्रित होती सूर्य की रश्मियों का ध्यान कर, तो निश्चय ही तुम्हें बहुत से पुत्रों की प्राप्ति होगी। यह आधिदैविक उपासना का वर्णन है ॥ २ ॥ [ साधक के संकल्प के अनुरूप प्राण शक्ति का नियोजन होता है। उसी के अनुसार एक या बहुत से पुत्र प्राप्त होने की बात कही गयी है।] अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥ अब आध्यात्मिक उपासना का वर्णन है। यह जो मुख्य प्राण है, उसी के रूप में उद्गीथ की उपासना करनी चाहिए, क्योंकि यह गमन करते हुए सर्वदा ॐकार स्वर का ही उच्चारण करता रहता है ॥ ३ ॥ एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणाꣳस्त्वं भूमानमभिगायताद्बहवो वै मे भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥ कौषीतकि ऋषि ने अपने पुत्र से कहा- मैंने विशेषतः इसी मुख्य प्राण को लक्ष्यकर ॐकार का गान किया था; अतः तू मेरा एक पुत्र हुआ। अब तू मुख्य प्राण के गुणभेद से विशिष्ट प्राणों का चिन्तन कर, तो निश्चय ही तुम्हारे बहुत से पुत्र होंगे ॥ ४ ॥ अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनु समाहरतीति ॥ ५ ॥
अध्याय १ खण्ड ६ मन्त्र ५ ९१
अध्याय १ खण्ड ६ मन्त्र ५ ९१ यथार्थ में जो उद्गीथ है, वही प्रणव (ॐ) है। जो प्रणव है, वही उद्गीथ है। इस रहस्य को जानने वाला होता के आसन से उद्गाता से हुए दोष युक्त उद्गान को ॐ उच्चारण करके संशोधन कर लेता है ॥५॥ [ यदि उद्गाता के गान में यज्ञ के उद्देश्य के अनुरूप भावों का स्पंदन न होने पाये, तो होता ॐकार के उद्गान से - मुख्य प्राण को तरंगित करके उस कमी की पूर्ति कर सकता है।] ॥ षष्ठः खण्डः ॥ इयमेवर्गग्निः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयत इयमेव साग्निरमस्तत्साम ॥ १ ॥ यह पृथ्वी ही ऋक् है और अग्नि साम है। वह अग्नि रूप साम, पृथिवी रूप ऋक् में प्रतिष्ठित है। अतः ऋचा में अधिष्ठित साम का गायन किया जाता है। पृथिवी को 'सा' और अग्नि को 'अम' मानकर दोनों को मिलाने से साम बनता है ॥ १ ॥ [ साम अर्थात् उद्गीथ को प्राण का संचरण कहा गया है। पृथ्वी तत्त्व (काष्ठ आदि ) जब प्राण संचरित करते हैं, तो अग्नि का स्वरूप बनता है। इसी प्रकार आगे अन्तरिक्ष का प्राण संचरण वायु तथा आकाश द्वारा प्राण संचरण से आदित्य का स्वरूप बनना मान्य है।] अन्तरिक्षमेवर्गवायुः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम। तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा वायुरमस्तत्साम ॥ २ ॥ अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम है। वह वायु रूप साम अन्तरिक्ष रूप ऋक् में प्रतिष्ठित है। अतः ऋचा में अधिष्ठित साम का गायन किया जाता है। अन्तरिक्ष को 'सा' और वायु को 'अम' मानकर दोनों को मिलाने से 'साम' बनता है ॥ २ ॥ द्यौरेवर्गादित्यः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम। तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते द्यौरेव सादित्योऽमस्तत्साम ॥ ३ ॥ आकाश ही ऋक् है और आदित्य साम है। वह आदित्य रूप साम द्यौ रूप ऋक् में प्रतिष्ठित है, अतः ऋचा में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है। आकाश को 'सा' और आदित्य को 'अम' मानकर दोनों को मिलाने से साम बनता है ॥ ३ ॥ नक्षत्राण्येवर्ग चन्द्रमाः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम। तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते। नक्षत्राण्येव सा चन्द्रमा अमस्तत्साम ॥ ४ ॥ नक्षत्र ही ऋक् है और चन्द्रमा साम है। वह चन्द्रमा रूप साम नक्षत्र रूप ऋक् में प्रतिष्ठित है, अतः ऋचा में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है। नक्षत्र को 'सा' और चन्द्रमा को 'अम' मानकर दोनों को मिलाने से साम बनता है ॥ ४ ॥ अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम तदेतदेतस्या- मृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते ॥ ५ ॥ यह जो आदित्य का श्वेत प्रकाश है, वही ऋक् है और जो नीलवर्ण मिश्रित कृष्ण प्रकाश है, वह साम है। वह नीलवर्ण रूप साम इस श्वेत ज्योति रूप ऋक् में अधिष्ठित है, अतः ऋचा में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है ॥ ५ ॥
९२ छान्दोग्योपनिषद अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्सामाथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥ यह आदित्य का श्वेत प्रकाश 'सा' है, नीलवर्ण मिश्रित कृष्ण प्रकाश 'अम' है। इन दोनों को मिलाने से साम बनता है। इस आदित्य के मध्य में एक स्वर्णिम पुरुष दिखाई देते हैं, जो स्वर्ण सदृश दाढ़ी-मूँछ वाले तथा स्वर्णिम केशों वाले हैं, जो नख से लेकर शिखा पर्यन्त सम्पूर्ण रूप से स्वर्णमय हैं ॥ ६ ॥ तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७॥ उस स्वर्णिम पुरुष के दोनों नेत्र बन्दर के बैठने के स्थान के सदृश अथवा कमल पुष्प के सदृश अरुणिम हैं। उनका नाम 'उत्' है, क्योंकि वह पापों से ऊपर उठे हैं। जो इस प्रकार जानते हैं, वह निश्चय ही पापों से ऊपर उठ जाते हैं ॥ ७ ॥ तस्यर्क् च साम च गेष्णौ तस्मादुद्गीथस्तस्मात्त्वेवोद्गातैतस्य हि गाता स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥ ऋग्वेद और सामवेद उसी पुरुष का वर्णन करते हैं। इसीलिए वह परमात्मा उद्गीथ है और उस 'उत्' का गान करने वाला उद्गाता कहलाता है। वह परम पुरुष 'उत्' आदित्य से ऊँचे लोकों और देवों का भी नियामक है और देवों की कामनाओं का पूरक है। यह उद्गीथ की आधिदैविक उपासना का स्वरूप हैं ॥ ८ ॥ ॥ सप्तमः खण्डः ॥ अथाध्यात्मं वागेवर्क् प्राणः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते वागेव सा प्राणोऽमस्तत्साम ॥ १ ॥ अब आध्यात्मिक उपासना का वर्णन किया जाता है। वाणी ही ऋक् है और प्राण साम है। इस प्रकार वाणी रूप ऋक् में प्राण रूप साम अधिष्ठित है। अतः ऋक् में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है। वाणी को 'सा' और प्राण को 'अम' मानकर इन्हें मिलाने से साम बनता है ॥ १ ॥ चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते चक्षुरेव सात्माऽमस्तत्साम ॥ २ ॥ चक्षु ही ऋक् है और आत्मा साम है। इस प्रकार चक्षुरूप ऋक् में आत्मारूप साम अधिष्ठित है। अतः ऋक् में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है। चक्षु को 'सा' और आत्मा को 'अम' मानकर इन्हें मिलाने से साम बनता है ॥ २ ॥ श्रोत्रमेवर्ङ्मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत्साम ॥ ३ ॥ श्रोत्र ही ऋक् है और मन साम है। इस प्रकार श्रोत्र रूप ऋक् में मनरूप साम अधिष्ठित है। अतः ऋक् में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है। श्रोत्र को 'सा' और मन को 'अम' मानकर उन्हें मिलाने से साम बनता है ॥ ३ ॥