भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

खण्ड २ मन्त्र ८ ७७ स ह मैत्रेयः प्रातः समित्पाणिर्मौद्गल्यमुपससादासावाग्रहं भो मैत्रेयः किमर्थमिति दुरधीयानं वा अहं भवन्तमवोचं त्वं मा यम्पृश्रमप्राक्षीन्नं तं व्यवोचं त्वामुपेव्यामि शान्तिं करिष्यामीति ॥ ४ ॥ वे हाथ में समिधा लिये प्रातःकाल ज्ञान के आग्रह के साथ मौद्गल्य के पास पहुँचे और बोले - हे आचार्य ! मैं मैत्रेय हूँ। मौद्गल्य ने पूछा- कैसे आगमन हुआ ? (मैत्रेय) मैंने आपको अयोग्य बताया था। आपने मुझसे जो प्रश्न पूछा था, वह मैं नहीं बता पाया। अब मैं आपके पास सेवा में उपस्थित होकर आपको सन्तुष्ट करूँगा ॥ ४ ॥ स होवाचात्र वा उपेतञ्च सर्वञ्च कृतं पापकेन त्वा यानेन चरन्तमाहूरथोऽयं मम कल्याणस्तंते ददामि तेन याहीति ॥ ५ ॥ मौद्गल्य ऋषि ने कहा- आप यहाँ आये हैं। लोग कहते हैं कि आप शुद्ध भाव से नहीं आये हैं; तो भी मैं आपको कल्याणकारी भावों का रथ देता हूँ, इसी से चलें ॥ ५ ॥ [ रथ का अर्थ होता है संवाहक ( कैरियर )- जो लक्ष्य तक पहुँचाये। मनुष्य अपने भावों के अनुरूप ही जीवन की गति प्राप्त करता है। कल्याण चाहने वालों को कल्याणकारी भावों का ही आश्रय लेना होता है।] स होवाचैतदेवात्रात्विषञ्चानृशंस्यञ्च यथा भवानाहोपायामित्येवं भवन्तमिति तं होपेयाय तं होपेत्य पप्रच्छ किंस्विदाहुर्भोः सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयः किमाहुर्धियो विचक्ष्व यदि ताः प्रवेक्ष्य प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति ॥ ६ ॥ मैत्रेय ऋषि ने कहा- आपका वचन अभयकारी और सत्य है। जैसा आप कहते हैं, वैसा ही करने के लिए मैं आपके पास उपस्थित हूँ। वे मौद्गल्य ऋषि के पास विधिपूर्वक उपस्थित हुए और पास आकर पूछने लगे- हे आचार्य ! सविता का वरणीय तत्त्व क्या है ? उस देव का भर्ग क्या है ? इसका उत्तर क्रान्तदर्शी क्या बताते हैं ? धी संज्ञक तत्त्व की व्याख्या क्या करते हैं, जिन्हें प्रेरित करता हुआ वह देव द्युलोक में प्रविष्ट होकर विचरण करता है ? ॥ ६ ॥ तस्मा एतत् प्रोवाच वेदाश्छन्दांसि सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयोऽन्नमाहुः । कर्माणि धियस्तदु ते ब्रवीमि प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति ॥ ७ ॥ उन मैत्रेय से मौद्गल्य ऋषि ने कहा- वैदिक छन्द सविता के वरणीय तत्त्व हैं। मेधावी पुरुष अन्न को ही उस देव का भर्ग बताते हैं। कर्म ही वह धी तत्त्व है, जिन्हें प्रेरित करता हुआ वह देव गमन करता है ॥ ७ ॥ [ सविता-सर्व प्रेरक है। छन्दों में जो उसके प्रेरक तत्त्व प्रकट हुए हैं, वे ही वरणीय हैं, अन्य अव्यक्त प्रवाह मनुष्य की ग्रहण शक्ति के परे होने से वरणीय नहीं हैं। धी बुद्धि को कहते हैं। सविता देव कर्म प्रेरक बुद्धि युक्त होकर विचरण करते हैं, ऐसा ऋषि का भाव प्रतीत होता है।] तमुपसंगृह्य पप्रच्छाधीहि भोः कः सविता का सावित्री ॥ ८ ॥ उसे सुनकर मैत्रेय ने मौद्गल्य से आदरपूर्वक पूछा- हे आचार्य ! हमें बताएँ, सविता क्या है और सावित्री क्या है ? ॥ ८ ॥