BharatKosha
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 83 of 505

Read in context
Page 83

॥ छान्दोग्योपनिषद् ॥ सामवेद की तलवकार शाखा के अन्तर्गत छान्दोग्य ब्राह्मण के अंश को इस उपनिषद् के रूप में मान्यता दी गई है। उक्त ब्राह्मण में १० अध्याय हैं। उसके अन्तिम ८ (आठ) अध्याय उपनिषद् रूप में लिये गये हैं। यह विशाल कलेवर वाले उपनिषदों में से एक है। नाम के अनुरूप इस उपनिषद् का आधार 'छन्दः' है। 'छन्दः' यहाँ साहित्यिक पद्य रचना के प्रकार तक ही सीमित नहीं है, उसका व्यापक अर्थ है। 'छन्दः' का अर्थ है-आच्छादित करने वाला। कवि जिस सत्य का साक्षात्कार करता है, वह सत्य, वह भाव हृदयंगम करने के लिए वह साहित्यिक छन्द का प्रयोग करता है। वह सत्य या भाव जिन अक्षरों, पदों, स्वरों आदि से आच्छादित होता है, वे सब उस साहित्यिक छन्द के अंगोपांग होते हैं। इसी प्रकार ऋषि इस सृष्टि के मूल सत्य को विभिन्न माध्यमों से व्यक्त होते, प्रकृति के विभिन्न घटकों से आच्छादित हुआ देखता है। अस्तु, उन सबको उन्होंने छन्द या साम या उद्गीथ के रूप में व्यक्त किया है। प्रथम अध्याय में ऋचा, साम आदि के सार रूप ॐकार की व्याख्या की गयी है। देवासुर संग्राम के उपाख्यान से ॐकार-उद्गीथ को केवल स्वर-श्वास आदि तक ही सीमित न रखकर उसे मुख्य प्राणों के स्पन्दन से जोड़ने का रहस्य समझाया है। फिर ॐकार की आध्यात्मिक, आधिदैविक उपासनाएँ समझाते हुए विभिन्न स्वरूप स्पष्ट किये गये हैं। दूसरे अध्याय में 'साम' को साधुता-श्रेष्ठता से जोड़ते हुए विभिन्न प्रकार की उपासनाओं का वर्णन किया गया है। तीसरे अध्याय में आदित्य को देवों का मधु कहकर उसकी विभिन्न दिशाओं से विभिन्न प्रकार के अमृर्तों की उपलब्धि का वर्णन है। इस मधुविद्या के अधिकारियों का उल्लेख करते हुए गायत्री की सर्वरूपता सिद्ध करके आदित्य की ब्रह्मरूप में उपासना का निर्देश दिया गया है। चौथे अध्याय में सत्यकाम जाबाल का वृषभ, अग्नि, हंस एवं मद्ग द्वारा ब्रह्म बोध कराये जाने का तथा उपकौशल को विभिन्न अग्नियों द्वारा शिक्षित किए जाने का उपाख्यान है। पाँचवाँ अध्याय प्राण विद्या परक है। श्वेतकेतु एवं प्रवाहण संवाद में अप्तत्त्व का पाँचवीं आहुति में व्यक्तिवाचक बन जाने तथा अश्वपति एवं ऋषियों के संवाद से प्राण की विभिन्न प्रकृतियों का उल्लेख है। छठवें अध्याय में ईश्वर एवं आत्मा के विभिन्न स्वरूपों को विभिन्न दृष्टान्तों से स्पष्ट किया गया है। सातवें अध्याय में ब्रह्म की विभिन्न रूपों में उपासना समझायी गई है। आठवें अध्याय में इन्द्र एवं विरोचन के कथानक द्वारा आत्मतत्त्व और ब्रह्मतत्त्व के साक्षात्कार के लिए तप द्वारा पात्रता अर्जित करने का महत्त्व दर्शाया गया है। अन्त में आत्मज्ञान की परम्परा एवं उसके फल का वर्णन है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ आप्यायन्तु..... इति शान्तिः (द्रष्टव्य- केनोपनिषद्) ॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत, ओमिति ह्युद्गायति तस्योपाख्यानम् ॥ १ ॥ 'ॐ' इस अक्षर का यज्ञ में उद्गाता द्वारा सर्वप्रथम उच्चारण किया जाता है। ॐ का उच्चारण करके उद्गाता सामगान करता है। उसी उद्गीथ साधना की यहाँ व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥ एषां भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपो रसोऽपामोषधयो रस ओषधीनां पुरुषो रसः पुरुषस्य वाग्रसो वाच ऋग्रस ऋचः साम रसः साम्न उद्गीथो रसः ॥ २ ॥

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २) · Page 83 of 505 · BharatKosha