१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context८४ छान्दोग्यापनिषद सम्पूर्ण प्राणियों अथवा पदार्थों का रस (सार) पृथिवी है। पृथिवी का रस (सारभाग) जल है, जल का रस ओषधियाँ हैं, ओषधियों का रस पुरुष है। पुरुष का रस वाक् है। वाणी का रस साम है। साम का रस उद्गीथ ॐकार है॥ २॥ स एष रसानाꣳ रसतमः परमः पराध्योऽष्टमो य उद्गीथः ॥ ३ ॥ यह ॐकार सभी रसों में सर्वोत्तम रस है। यह परमात्मा का प्रतीक होने के कारण उपास्य है। यह पृथिवी आदि रसों में आठवाँ है॥ ३॥ [ रसों में आठवाँ होने का अपना महत्त्व है। यह सृष्टि सात-सात के वर्गों में विभक्त है, सप्तलोक, सप्तराग, सप्तरंग, सप्तव्याहृतियाँ आदि। आठवाँ पिछले सप्तक का समापक तथा नये सप्तक का प्रारंभिक होता है। ॐ में सभी रस समाहित भी होते हैं तथा उसी से सब प्रकट भी होते हैं, गूढ़ार्थ में आठवाँ कहने का यही भाव प्रतीत होता है।] कतमा कतमर्कतमत्कतमत्साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति ॥४॥ अब यह विचार किया जाता है कि कौन-कौन सा ऋक् है, कौन सा साम है और कौन सा उद्गीथ है॥ वागेवर्क् प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथस्तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्चर्क् च साम च॥ वाक् ही ऋक् है, प्राण ही साम है और ॐकार ही उद्गीथ है। जो ऋक् रूप वाणी और सामरूप प्राण है, ये (मिथुन) जोड़े प्रसिद्ध हैं॥ ५॥ [ प्राण ही साम है। सामगान केवल वाणी की कलाकारिता नहीं है, उसमें वाणी के साथ प्राण का स्पन्दन भी जुड़ा होना चाहिए। यदि प्राण में अन्तः स्फूर्त तरंगें नहीं उठतीं, तो साम गान नहीं बन पाता। सामान्य गायन की प्रभावोत्पादकता में भी यही तथ्य कार्य करता है।] तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे सꣳसृज्यते यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य कामम्॥ ६ ॥ जिस प्रकार मिथुन (स्त्री-पुरुष) का मिलन एक दूसरे की कामनाओं की पूर्ति करता है, उसी प्रकार इस (वाणी और प्राण अथवा ऋचा और साम के) जोड़े के संयोग से ॐकार का संसृजन होता है॥ ६ ॥ आपयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ७ ॥ जो विद्वान् उद्गीथ रूप ॐकार की उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओं की प्राप्ति कराने वाला होता है॥ तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि किंचानुजानात्योमित्येव तदाह एषा एव समृद्धिर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ८ ॥ यह ॐकार अनुमति सूचक है। जब कोई किसी को अनुमति देता है, तो ॐकार कहकर उसे प्रकट करता है। यह अनुमति ही समृद्धिप्रद है। यह जानने वाला जो विद्वान् ॐकार की उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति करने वाला होता है॥ ८॥ [ यह सृष्टि ब्रह्म के संकल्प से बनी है। सृष्टि उत्पादन के पीछे उसकी अनुमति, सृष्टि सृजन की संमति ही मूल कारण है। जिस ऋद्धि-सिद्धि या साधन के लिए ब्रह्म की अनुमति हो जाती है, वही तत्त्व अस्तित्व में आ जाता है। अस्तु, ब्रह्म की अनुमति ही समृद्धि है, ऋषि का यह कथन बहुत मर्मयुक्त है।] तेनेयं त्रयी विद्या वर्तत ओमित्याश्रावयत्योमिति शꣳसत्योमित्युद्गायत्ये- तस्यैवाक्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन ॥ ९ ॥ ॐ अक्षर से ही त्रयी (वेदत्रयी अथवा त्रिगुणात्मिका सृष्टि की) विद्या (यज्ञादि या सृष्टि सृजन) कर्म में प्रवृत्त होती है। ॐ कहकर ही अध्वर्यु आश्रावण (आदेश) कर्म करता है। ॐ कहकर ही होता शंसन