१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextजाता है। आग के अङ्गारों पर लेटना भी ऐसा लगता है जैसे चन्दन का लेप कर लिया हो। देह पर निरन्तर होने वाली घातक वाण वर्षा भी गर्मी को शान्त करने वाली शीतल जल के फुब्बारे के समान मन प्रसन्न करने वाली हो जाती है। सिर का कट जाना सुखदायिनी निद्रा के समान होता है। गूँगा हो जाना मौनावलम्बन के समान और बहिरा हों जाना उन्नति के समान सुखप्रद होता है। परन्तु ऐसी अवस्था उपेक्षा से नहीं मिल सकती। इसकी प्राप्ति वैराग्य से उत्पन्न हुये आत्मज्ञान द्वारा ही सम्भव है। गुरुशास्त्र के वचनों और अपने अनुभव के आधार पर जो मानसिक पवित्रता प्राप्त होती है, उसी के द्वारा निरन्तर आत्म साक्षात्कार होते रहना सम्भव है। जैसे भभूड़े के नष्ट होने पर दिशा का ज्ञान पुनः होने लगता है, वैसे ही विज्ञान द्वारा ध्वस्त हुये विश्व की स्थिति नहीं रहती। धन, मित्र, बन्धु, पुत्र-परिजन आदि मनुष्य का उपकार नहीं कर सकते। शारीरिक क्लेश के नष्ट होने से अथवा तीर्थस्थान में वास कर लेने मात्र से ही मनुष्य लाभान्वित नहीं हो सकता, वह तो चिन्मात्र में लय होकर ही परमपद पा सकता है ॥ १८—२८ ॥
यानि दुःखानि या तृष्णा दुःसहा ये दुराधय । शान्तचेतःसु तत् सर्वं तमोऽर्केष्विव नश्यति ॥२९ मातरीव परं यान्ति विषमाणि मृदूनि च । विश्वासमिह भूतानि सर्वाणि शमशालिनि ॥३० न रसायनपानेन न लक्ष्म्यालिङ्गितेन च । न तथा सुखमाप्नोति शमेनान्तर्यथा जनः ॥३१ श्रुत्वा स्पृष्ट्वा भुक्त्वा च दृष्ट्वा ज्ञात्वा शुभाशुभम् । न हृष्यति ग्लायति यः स शान्त इति कथ्यते ॥३२ तुषारकरबिम्बाच्छं मनो यस्य निराकुलम् । मरणोत्सवयुद्धेषु स शान्त इति कथ्यते ॥३३ तपस्विषु बहुज्ञेषु याज्ञकेषु नृपेषु च ।