१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextमहोपनिषद् [ १२३ ] बलवत्सु गुणाढ्येषु शमवानेव राजते ॥३४॥ संतोशामृतपानेन ये शान्तास्तृप्तिमागताः । आत्माराम महात्मानस्ते महापदमागताः ॥३५॥ अप्राप्तं हि परित्यज्य संप्राप्ते समतां गतः । अदृष्टखेदाखेदो यः संतुष्ट इति कथ्यते ॥३६ नाभिनन्दत्यसंप्राप्तं भुङ्क्ते यथेप्सितम् । यः स सौम्यसमाचारः सन्तुष्ट इति कथ्यते ॥३७ रमते धीर्ययाप्राप्ते साध्वीवान्तः पुराजिरे । सा जीवन्मुक्ततोदेति स्वरूपानन्दायिनी ॥३८ यथाक्षणं यथाशास्त्रं यथादेशं यथासुखम् । यथासंभवसत्सङ्गममं मोक्षपथक्रमम् । तावद्विचारयेत् प्राज्ञो यावद्विश्रान्तमात्मनि ॥३९ तुर्यविश्रान्तियुक्तस्य निवृत्तस्य भवार्णवात् । जीवतोऽजीवताश्चैव गृहस्थस्याथवा यतेः ॥४० नाकृतेन कृतेनार्थो न श्रुतिस्मृतिविभ्रमैः । निर्मन्थर इवाम्भोधिः तिष्ठति यथास्थितः ॥४१ संसार में जितने दुःख, जितनी तृष्णायें और दुश्चिन्ताएं हैं, वे सब शान्त मन वाले पुरुष में, सूर्य की किरणों से अन्धकार दूर होने के समान ही नष्ट हो जाती हैं, जैसे माता का पुत्र विश्वास करते हैं, वैसे ही शम वाले पुरुष का सभी मृदु एवं कठोर प्राणी पूर्ण विश्वास करते हैं । जो सुख मनुष्य को शांति से प्राप्त होता है, वैसा सुख लक्ष्मी के आलिंगन द्वारा अथवा अमृत का पान करने पर भी नहीं मिल सकता । शांत मनुष्य वही है जो शुभ-अशुभ को सुनकर भी हर्ष विषाद नहीं करता और भूखा रहने पर या भोजन कर लेने पर दुःख-सुख को नहीं मानता । जिसका मन चन्द्रमा के समान अत्यन्त निर्मल है और जो उत्सव, युद्ध अथवा मृत्यु में भी हर्ष-शोक द्वारा अधीर नहीं होता वहीं