१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context१२४ ] चतुर्थ अध्याय पुरुष शान्तचित्त कहा जाता है। याज्ञिकों तपस्वियों, बहुश्रुतों, राजाओं, गुणवानों तथा वनवासियों में भी वही शोभा पाता है जो शम से युक्त है। आत्मा में रमण करने वाले महात्मा वही होते हैं जो सन्तोष रूपी अमृत को पीकर शान्त और तृप्त होते हैं। उन्हीं को परमपद की प्राप्ति होती है। सन्तुष्ट वही कहा जाता है जो सम्प्राप्त वस्तु में समान भाव रखता तथा अप्राप्त वस्तु की लालसा नहीं करता और जो सुख-दुख को नहीं देखता। प्राप्त वस्तु के भोग में सन्तुष्ट रहने वाला, अप्राप्त वस्तु की चिन्ता न करने वाला पुरुष समान भाव का आचरण करता है, वही सन्तुष्ट है। जैसे साध्वी नारी अपने घर के आंगन में रहती हुई सुख मानती है, वैसे ही जो प्राप्त हो जाय उसी में सुख मानती हुई बुद्धि रमण करती है, वही अत्यन्त आनन्ददायिनी अवस्था जीवन्मुक्त कही जाती है। जब तक आत्म-विश्रान्ति की प्राप्ति न हो जाय तब तक समय के अनुसार, देश के अनुरूप और शास्त्र के अनुकूल यथासम्भव सत्सङ्ग करते हुए मोक्ष-मार्ग का विचार करता रहे। तुरीयावस्था की विश्रान्ति से युक्त तथा संसार समुद्र से निवृत्त जो पुरुष है, वह गृहस्थ हो या सन्यासी, चाहे सांसारिक जीवन में रहे या न रहे, उसे श्रुति-स्मृति के भ्रम जाल में पड़ने की आवश्यकता नहीं रहती। वह तो उत्पलवहीन समुद्र के समान आत्म-स्थित रहकर ही सब कुछ प्राप्त कर लेता है ॥२६-४१॥ सर्वात्मवेदनं शुद्धं यदोदेति तदात्मकम् । भाति प्रसृतिदिक्कालाबह्यं चिद्रूपदेहकम् ॥४२ एवामात्मा यथा यत्र समुल्लासमुपागतः । निष्ठात्याशु तथा तत्रतद्रूपश्च विराजते ॥४३ यदिदं दृश्यते सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् । तत् सुषुप्ताविव स्वप्नः कल्पान्ते प्रविनश्यति ॥४४ ऋतमात्मा परं ब्रह्म सत्या मित्यादिका बुधैः । कल्पिता व्यवहारार्थं यस्य संज्ञा महात्मनः ॥४५॥