१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context१३६ ] [ चतुर्थ अध्याय नाश होना है। मन के द्वारा जो कुछ भी अनुभव में आवे, उसमें चित्त को मत रमने दो। आस्था का त्याग करना ही मुक्ति है और आस्था के आश्रित रहना ही साक्षात् दुःख है। जो प्रज्ञावान हैं, उनमें अविद्या का स्पर्श भी नहीं होता। उनसे अविद्या दूर ही रहती है। यह प्रज्ञाहीन पुरुषों में ही विद्यमान रहती है। [यह संसार रूपी भ्रमजाल दुःख रूप कंटकों से ओत-प्रोत है और इसे नष्ट करने वाली आत्मसाक्षात्कार की इच्छा जब तक बलवती नहीं होती, तब तक अविद्या इन देहों को निरन्तर भ्रमाती रहती है। जब वह अविद्या परतत्व की ओर से देखती है, तब वह स्वयं ही विनष्ट हो जाती है। सर्वात्मबोध के दर्शन होते ही अविद्या स्वयं ही छिप जाती है। उस अविद्या का स्वरूप केवल इच्छा का नष्ट होना ही मोक्ष कहा गया है। परन्तु इच्छा नष्ट तभी होती है जब संकल्पों का नाश हो जाय अन्यथा इच्छानाश सम्भव नहीं है ॥१०३-११४॥ मनागपि मनोव्योम्नि वासनारजनीक्षये। कालिका तनुतामेति चिदादित्यावलोकनात् ॥११५ चैत्यानुपांत रहितं सामान्येन च सर्वगम् । यच्चित्तत्वमनाख्येयं स आत्मा परमेश्वरः ॥११६ सर्वं च खल्विदं ब्रह्म नित्यचिद्घनमक्षतम् । कल्पनाऽन्या मनोनाम्नी विद्यते न हि काचन ॥११७ न जायते न म्रियते किंचिदत्र जगत्त्रये । न च भावविकाराणां सत्ता क्वचन विद्यते ॥११८ केवलं केवलाभासं सर्वसामान्यमक्षतम् । चैत्यानुपातरहितं चिन्मात्रमिह विद्यते ॥११९ तस्मिन् नित्ये तते शुद्धे चिन्मात्रे निरुपद्रवे । शान्ते शमसमाभोगे निर्विकारे चिदात्मनि ॥१२० यैषा स्वभावाभिमतं स्वयं सकं प्य धावति ।