१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextमहोपनिषत् ] [ १३७ चिच्चैत्यं स्वयमम्ला नंमनाम्न उच्यते ॥१२१ कलि रूपी अन्धकार को नष्ट करने के लिये चित्त रूपी आकाश में वासना रूपी रात्रि के क्षीण होने और चेतना रूपी सूर्य के प्रकाशित होने की आवश्यकता है । चित्त जब विषयों का सङ्ग छोड़ देता है और सब ओर गमन करने वाला हो जाता है, तब उसकी वह अवस्था अनि- वंचनीय होती है । अवश्य ही यह ब्रह्म है, यही अव्यय, नित्य एवं चिद्रूप है। इससे भिन्न जो मन नाम की कल्पना की जाती है, उसका कहीं अस्तित्व नहीं है। वह तो केवल भ्रम ही है। यह भी दृश्य विकार अस्तित्वहीन हैं। इस जगत में कोई न जन्म लेता है और न कोई मृत्यु को प्राप्त होता है। यह सभी मिथ्या है। केवल सर्वव्याप्त, अव्यय, आभास रूप एवं चित्त के विकारों के अनुगत न होने वाले चिन्मात्र आत्मा का ही यहां अस्तित्व है। वह चिदात्मा नित्य, व्यापक, उपद्रव रहित, शान्त शुद्ध स्वरूप और निर्विकार भाव से शम रूप में स्थित है, उसमें जो चित्त स्वयं ही सङ्कल्पपूर्वक जाता है, चित्त की वही सङ्कल्प रूप अवस्था स्वयं निर्दोष होते हुये भी मन मन कही जाती है । इसलिए मन सङ्कल्प के द्वारा ही नष्ट हो जाता है ॥ ११५-१२१ ॥ अतः संकल्पसिद्धेयं संकल्पेनैव नश्यति । नाहं ब्रह्मेति संकल्पात् सुदृढाद्बध्यते मनः । सर्वं ब्रह्मेति संकल्पात् सुदृढान्मुच्यते मनः ॥१२२ कृशोऽहं दुःखबद्धोऽहं हस्तपादादिमानहम् । इति भावानुरूपेण व्यवहारेण बध्यते ॥१२३ नाहं दुखीं न मे देहो बन्धः कोऽस्यात्मनि स्थितः । इति भावानुरूपेण व्यवहारेण मुच्यते ॥१२४ नाहं मांसं न चास्थीनि देहादन्यः परोऽस्म्यहम् । इति निश्चितवाननन्तः क्षीणाविद्यो विमुच्यते ॥१२५ कथियतेयमविद्येयमनात्मन्यात्मभावनात ।