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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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१७४ ] [ षष्ट अध्याय तादृशाः पुरुषा यान्ति मादृशां गणनैव का ॥२५॥ संसार एव दुःखानां सीमान्त इति कथ्यते । तन्मध्ये पतिते देहे सुखमासाद्यते कथम् ॥२६॥ प्रबुद्धोऽस्मि प्रबुद्धोऽस्मि दुष्टश्चोरोऽयमात्मनः । मनो नाम निहन्म्येनं मनसाऽस्मि चिरं हतः ॥२७॥ मा खेदं भज हेयेषु नोपादेयपरो भवः । हेयादेयहशो त्यक्त्वा शेषस्थः सुस्थिरो भव ॥२८॥ निराशता निर्भयता नित्यता समता ज्ञता । निरीहता निष्क्रियता सौम्यता निर्विकल्पता ॥२६॥ धृतिमैत्री मनस्तुष्टिर्मुदुता मृदुभाषता । हेयोपादेयनिर्मुक्ते ज्ञे तिष्ठन्त्यपवासनम् ॥३०॥ गृहीततृष्णाशबरीवासनाजालमाततम् । संसारवारिप्रसृतं चिन्तातन्तुभिराततम् ॥३१॥ अनया तीक्ष्णया तात छिन्दि बुद्धिशलाकया । वात्ययेवाम्बुदं जालं छित्त्वा तिष्ट तते पदे ॥३२॥ यह देह रूप भ्रम संसार रूप रात्रि में दुःख स्वप्न के समान है और इसका प्रसार भी पवित्रता से परे है । बाल्यकाल में अज्ञान घेरे रहता है और युवावस्था में नारी के नयन बाण द्वारा मारा हुआ रहता है, तो अन्तकाल में ही यह स्त्री पुत्रादि की चिन्ता में रत रहने वाला अधम अपना क्या उपकार कर सकता है ? सत् के ऊपर असत् का बोल- बाला है, रमणीयता पर कुरुपता चढ़ी हुई है, सुख के ऊपर दुःख है तब मुझे किसकी शरण लेनी चाहिये ? जिनके निमेष और उन्मेष में संसार का अन्त और उत्पत्ति निहित है, वैसे पुरुष भी जब काल कलवित हो जाते हैं, तब मेरे जैसे तुच्छ पुरुषों की तो बात ही क्या है । जिस संसार को दुःखों की अन्तिम परिधि माना गया है, उस संसार में पड़े रहने वाला देह सुख का रस कैसे चख सकता है । मेरी आत्मा को चुराने वाला चोर

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