१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextCC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri महोपनिषत् ] [ १७५ मेरा यह दूषित मन ही है। इससे मुझे न जाने कब का चुरा लिया है ? अब मैं जान गया हूँ। इसलिए इसका संहार कर डालूँगा। हेय पदार्थों के लिए दुःखित होने से कोई लाभ नहीं और उपादेय पदार्थों में भी आसक्ति रखना व्यर्थ है। इसलिए हेय और उपादेय की भेद-दृष्टि का त्याग करके शेष में ही अवस्थित हो जाओ क्योंकि ज्ञानी पुरुष में नित्यता, अभिज्ञता, समता, निष्क्रियता, निष्कामता, सांसारिक विकारों में निराशा, निर्विकल्पता, सौम्यता, मृदुता, धृति, मैत्री, सन्तोष और मिष्ट भाषण आदि गुण विद्यमान रहते हैं। तृष्णा रूपिणी भीलनी ने वासना रूपी जाल फैला दिया है, उसमें तुम फँस गये हो। यह मृग मरीचि- कात्मक जल चिन्ता रूपिणी रश्मियों द्वारा सब ओर फैला दिया गया है। हे पुत्र ! इस माया को ज्ञानरूपी तीक्ष्ण अस्त्र से काट कर अपने व्यापक रूप में उसी प्रकार स्थिति होओ, जिस प्रकार बवंडर मेघों के जाल को काट डालता है ॥ २२-२३ ॥ मनसैव मनश्छित्त्वा कुठारेगोव पादपम् । पदं पावनमासाद्य सद्य एव स्थिरो भव ॥२३ तिष्ठन् तच्छन् स्वपन् जाग्रन्निवसन्नुत्पतन् पतन् । असदेवेदमित्यन्तर्निश्चित्यास्थां परित्यज्य ॥३४ दृश्यमाश्रयसीदं चेत् तत् सचित्तोऽसि बन्धवान् । दृश्यं संत्यजसीदं चेत् तदचित्तोऽसि मोक्षवान् ॥३५ नाहं नेदमिति ध्यायस्तिष्ठ त्वमचलाचलः । आत्मनो जगत्क्ष्यान्तर्द्रष्टृदृश्यदशान्तरे ॥३६ दर्शनाख्यं स्वात्मनः सर्वदा भावयन् भव । स्वाद्यस्वादकसंयक्तं स्वाद्यस्वादकमध्यगम् ॥३७ स्वदनं केवलं ध्यायन् परमात्ममयो भव । अवलम्ब्य निरालम्बं मध्येमध्ये स्थिरो भव ॥३८ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi