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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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१७६ ] [ षष्ठ अध्याय रज्जुबद्धा विमुच्यन्ते तृष्णाबद्धा न केनचित् । तस्मान्निदाघ तृष्णां त्वं त्यज संकल्पवर्जनात् ॥३६॥ एतामहं भावमयीमपुण्यां छित्त्वाऽनहंभावशलाकयैव । स्वभावजां भव्यभवान्तभूमौ भव प्रशान्ताखिलभूत- भीतिः ॥४०॥ अहमेषां पदार्थानामेते च मम जीवितम् । नाहमेभिर्विना कश्चिन्न मयैते विना किल ॥४१॥ इत्यन्तर्निश्चयं त्यक्त्वा विचार्य मनसा सह । नाहं पदार्थस्य न मे पदार्थ इति भाविते ॥४२॥ अन्तःशीतलया बुद्ध्या कुर्वतो लीलया क्रियाम् । यो नूनं वासनात्यागो ध्येयो ब्रह्मन् प्रकीर्तितः ॥४३॥ जैसे वृक्ष के बँटे में लगी हुई कुल्हाड़ी वृक्ष को ही काट डालती है, वैसे ही मन से मन को काट कर पवित्र पद में अवस्थित होओ । उठते-बैठते, चलते, खड़े होते, सोते, जागते आदि सभी स्थितियों में सब को असत् रूप मानने हुए दृश्य पदार्थों से आस्था को हटा लो क्योंकि दृश्य का आश्रय लेने मात्र से चित्त युक्त बन्धन में पड़ना होता है । दृश्य का त्याग कर देने मात्र से चित्त-शून्यता के कारण मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी होते हो । 'न संसार है और न मैं हूँ' इस प्रकार की भावना करते हुए पर्वत के समान दृढ़ हो जाओ । आत्मा और विश्व के मध्य तथा दृश्य के मध्य भी स्वयं को दर्शन रूप आत्मा ही मानो । स्वादयुक्त पदार्थ तथा उसे चखने वाले से और इन दोनों के मध्य में स्थिति केवल स्वाद का ध्यान करते हुए परमात्ममय होकर रहो । यह ध्यान रखो कि रस्सी के बन्धन में पड़े हुए तो छूट जाते हैं, परन्तु तृष्णा से बन्धन में पड़े प्राणी किसी प्रकार भी नहीं छूटते । इसलिए इस पापमयी तृष्णा को छिन्न-भिन्न कर डालो क्योंकि यह अहङ्कार वाली और संकल्पमयी