१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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प्रत्येक तत्व के आधे भाग से और दूसरे तत्वों की सोलह कलाओं से अन्तःकरण, व्यान, चक्षु, रस, गुदा (अर्थात् आकाशादि पाँचों) भूतों की स्थिति है । आकाश से लगाकर प्रत्येक भूत का मुख्य पूर्व भाग और अन्य भूतों के पिछले चार चार भाग पाँचों भूतों में स्थित रहते हैं ॥१-२॥ मुख्य भाग से ऊपर वाले को सूक्ष्म भूत जाने और पिछले को स्थूल जाने । इसी प्रकार ये एक दूसरे के अंश से सम्मिलित होते हैं ॥ ३ ॥ ये सब भूत इसी प्रकार एक दूसरे का आश्रय लेकर परस्पर में ओत-प्रोत हैं और इनसे युक्त यह पंचभूतमय पृथ्वी चेतन तत्व से समन्वित है ॥४॥ फिर इस पृथ्वी से ओषधि, अन्न, चारों प्रकार के पिण्ड, रस रक्त, मांस, मेद, अस्थि, वीर्य आदि सप्त धातुओं की उत्पत्ति होती है ॥ ५ ॥
केचित्तद्योगतः पिण्डा भूतेभ्यः संभवा क्वचित् । तस्मिन्नन्नमयः पिण्डो नाभिमण्डलसंस्थितः ॥६ अस्य मध्येऽस्ति हृदयं सनालं पद्मकोशवत् । सत्वान्तर्वर्तिनो देवाः कर्त्रहंकारचेतनाः ॥७ अस्य बीजं तमःपिण्डं मोहरूपं जडं घनम् । वर्तते कण्ठमाश्रित्य मिश्रीभूतमिदं जगत् ॥८ प्रत्यगानन्दरूपात्मा मूर्ध्नि स्थाने परंपदे । अनन्तशक्ति संयुक्तो जगद्रूपेण भासते ॥९ सर्वत्र वर्तते जाग्रत्स्वप्नं जाग्रति वर्तते । सुषुप्तं च तुरीयं च नान्यावस्थासु कुत्रचित् ॥१०
उन धातुओं के योग से कहीं पिण्डों की उत्पत्ति हो जाती है, नाभिस्थान में अन्नमय पिण्ड स्थित है ॥ ६ ॥ उसके मध्य भाग में नाल- युक्त पद्मकोश के समान हृदय है, उसके भीतर वे देवता स्थित हैं जिनमें