१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 196, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें१८८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ब्रह्मा, दिशा, वायु, सूर्य, वरुण अश्विनीकुमार, अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, प्रजापति और यम—ये बारह इन्द्रियों के अधिदेवता रूप से बारह नाड़ियों में स्थित रहते हैं, ये प्राण ही हैं। अंगों का ज्ञानरूप ही जाता है। अब आकाश, वायु, अग्नि, जल, अन्न का पञ्चीकरण इस प्रकार है। समान वायु के योग से ज्ञात करना होता है, श्रोत्र द्वारा शब्दरूपी गुण वाणी के आश्रय से आकाश में स्थित है और आकाश भी स्थित है। व्यान वायु के योग से मन है, त्वचा द्वारा स्पर्श गुण हाथ के सहारे वायु में स्थित है और वायु भी स्थित है। उदान वायु के योग से बुद्धि है, चक्षु द्वारा रूप गुण पैर के सहारे अग्नि में स्थित है और अग्नि स्थित है। अपान वायु के योग से चित्त है, जिह्वा द्वारा रस गुण उपस्थ के सहारे जल में स्थित है। प्राण वायु के योग से अहङ्कार है, नासिका द्वारा घ्राण गुण गुदा के सहारे पृथिवी में स्थित है और पृथिवी भी स्थित है, यह ज्ञातव्य है। इस विषय के ये श्लोक हैं ॥६-६॥
अत्रैते श्लोका भवन्ति— पृथग्भूते षोडश कलाः स्वार्धभागान् परान् क्रमात् । अन्तःकरणव्यानाक्षिरसपायुनभः क्रमात् ॥१॥ मुख्यान् पूर्वोत्तरैर्भागैर्भूतेभूते चतुश्चतुः । पूर्वमाकाशमाश्रित्य पृथिव्यादिषु संस्थितः ॥२॥ मुख्या ऊर्ध्वे परा ज्ञेया ना [आ] परानुत्तरान्विदुः । एवमशो अभूत्तस्मात्तेभ्यश्चांशो अभूत्तथा ॥३ तस्मादन्योन्यमाश्रित्य ह्यो तं प्रोतमनुक्रमात् । पञ्चभूतमया भूमिः सा चेतनसमन्विता ॥४ तत ओषधयोऽन्नं च ततः पिण्डाश्चतुर्विधाः । रसासृङ् मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्लानि धावतः ॥५ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi