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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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२५२ ] [ योगकुण्डल्‍युपनिषत् यथा लगति कण्ठात्तु हृदयावधि सस्वनम् । पूर्ववत्कुम्भयेत्प्राणं रेचयेदिडया ततः ॥२७ शीर्षोदिता नलहरं गलश्लेष्महरं परम् । सर्वरोगहरं पुण्यं देहानलविवर्धनम् ॥२८ नाडीजलोदरं धातुगतदोषविनाशनम् । गच्छतस्तिष्ठतः कार्यमुज्जय्याख्यं तु कुम्भकम् ॥२६ जिह्वया वायुमाकृष्य पूर्ववत्कुम्भकादनु । शनैस्तु घ्राणरन्ध्राभ्यां रेचयेदनिलं सुधीः ॥३० गुल्मप्लीहादिका दोषाः क्षयं पित्तं ज्वरं तृषाम् । विषाणि शीतली नाम कुम्भकोऽयं निहन्ति च ॥३१ इस क्रिया को सूर्य भेदन कहते हैं, इसका अभ्यास बार-बार करते रहना चाहिये । अब उज्जायी को बतलाते हैं कि मुख बन्द करके दोनों नासिकाओं से वायु को धीरे से खींचे जिससे वह शब्द करती हुई कण्ठ से लेकर हृदय तक भर जाय । तब पूर्ववत् कुम्भक करके बाँयी नासिका से रेचक करे, इससे मस्तक की उष्णता, गले का कफ और अन्य अनेक रोग दूर हो जाते हैं और देह की अग्नि की वृद्धि होती है । इससे नाड़ी सम्बन्धी जलोदर और धातु सम्बन्धी रोग भी दूर हो जाते हैं । इस उज्जायी कुम्भक को चलते-फिरते, स्थिर रहते सदैव करते रहना चाहिये ॥ ३६--२६ ॥ शीतली नामक प्राणायाम करते समय वायु को जिह्वा द्वारा खींचकर पूर्ववत् कुम्भक किया जाता है फिर नासिका के छिद्रों से वायु को शनैः निकाल दिया जाता है । इससे गुल्म, प्लीहा, पित्त ज्वर, तृषा आदि दूर होते हैं ॥ ३०--३१ ॥ ततः पद्मासनं बद्ध्वा समग्रीवोदरः सुधीः । मुखं संयम्य यत्नेन प्राणं घ्राणेन रेचयेत् ॥३२.