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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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प्रथम अध्याय ] [ २५३ यथा लगति कण्ठात्तु कपाले सस्वनं ततः । वेगेन पूरयेत् किञ्चिद्धृत्पद्मावधि मारुतम् ॥ ३३ पुनर्विरचेयत्तद्वत्पूरयेच्च पुनः पुनः । यथैव लोहकाराणां भस्त्रावेगेन चाल्यते ॥३४ तथैव स्वशरीरस्थं चालयेत्पवनं शनैः । यथा श्रमो भवेद्देहे तथा सूर्येण रेचयेत् ॥३५ यथोदरं भवेत्पूर्णंपवनेन तथा लघु । धारयन्नासिकामध्यं तर्जनीभ्यां बिना दृढम् ॥३६ कुम्भक पूर्ववत्कृत्वा रेचयेदिडयाऽनिलम् । कण्ठोत्थितानलहरं शरीराग्निविवर्धनम् ॥३७ कुण्डलीबोधकं पुण्यं पापघ्नं शुभदं सुखम् । ब्रह्मनाडीमुखान्तस्थक फाद्यर्गलनाशनम् ॥३८ गुणत्रयसमुद्भू तग्रन्थित्रयविभेदकम् । विशेषेणैव कर्तव्यं भस्त्राख्यंकुम्भक त्विदम् ॥३६ अब भस्त्रिका प्राणायाम को बतलाते हैं कि पद्मासन लगाकर गर्दन और देह को सीधा रखते हुए, मुख को बन्द करके वायु को सावधानी पूर्वक नासिका से रेचन करे । फिर वायु को वेगपूर्वक शब्द करते हुए ऐसे खींचे कि कण्ठ, तालु, कपाल तथा हृदय को उसका स्पर्श जान पड़े । फिर उसे बाहर निकालकर पुनः पूरक करे, इस प्रकार वायु को बार-बार वेग पूर्वक इस प्रकार खींचे और भरे जैसे लुहार की भाथी चलती है । इसी विधि से शरीर स्थित वायु को सँभालकर चलावे । जब श्रम जान पड़े तब सूर्य नाड़ी से पूरक करे और तर्जनी के अतिरिक्त चारों ओर अँगुलियों से नासिका को मध्य से दृढ़तापूर्वक पकड़ कर कुम्भक करे तथा फिर बांयी नाक से रेचक करदे यह अभ्यास कण्ठ की जलन को मिटाता है और शरीर की अग्नि को बढ़ाता है, कुण्डली को जगाता है, पुण्यकारी, पाप नाशक