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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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२५४ ] [ योगकुण्डल्‍युपनिषत् शुभ और सुखदायक है। ब्रह्मनाड़ी (सुषुम्ना) के मुख पर जो कफ आदि रहता है उसको नष्ट करने वाला है। यह सत् आदि तीनों गुणों से उत्पन्न तीनों ग्रन्थियों का भेदन करने वाला है। इसीलिये इस भस्त्रिका नामक प्राणायाम का विशेष रूप से अभ्यास करना चाहिये ॥३२-३६॥ चतुर्णामपि भेदानां कुम्भके समुपस्थिते । बन्धत्रयमिदं कार्यं योगिभिर्वीतकल्मषैः ॥४० प्रथमो मूलबन्धस्तु द्वितीयोड्डीयणाभिधः । जालन्धरस्तृतीयस्तु तेषां लक्षणमुच्यते ॥४१ अधोगत्तिमपानं वै ऊर्ध्वगं कुरुते बलात् । आकुञ्चनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते ॥४२ अपाने चोर्ध्वगे याते संप्राप्ते वह्निमण्डले । ततोऽनलशिखा दीर्घा वर्धते वायुना हृता ॥४३ ततो यातौ वह्न्यपानौ प्राणमुष्णस्वरूपकम् । तेनात्यन्तप्रदीप्तेन ज्वलनो देहजस्तथा ॥४४ तेन कुण्डलिनी सुप्ता संतप्ता संप्रबुध्यते । दण्डाहतभुजङ्गीव निश्वस्य ऋजुतां व्रजेत् ॥४५ इस प्रकार इन चारों प्रकार के प्राणायामों को रोकने के साथ- साथ योगी को तीन 'बन्ध' भी करने चाहिए । इनमें से पहला मूलबन्ध, दूसरा उड्डियाण और तीसरा जालन्धरबन्ध कहा जाता है ॥४०-४१॥ अधोगति वाले अपान को शक्तिपूर्वकं गुदा के आकुंचन द्वारा ऊपर ले जाने से मूलबन्ध होता है। अपान ऊपर जाकर वह्निमंडल से मिलता है तो उसके प्रभाव से अग्नि की तीव्रता बहुत अधिक हो जाती है। उस ज्वाला से संतप्त होकर सोई हुई कुण्डलिनी जागृत होती है और

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