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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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स्थिति विनाश, तिरोधान और अनुग्रह आदि की सामर्थ्यवाली तथा अविनाशिनी होने से साक्षात् शक्ति कही जाती हैं ॥ ३४ ॥ 'सीताजी का इच्छाशक्ति रूप भी त्रिविध है। वे ही योगशक्ति प्रलयकाल में विश्राम के निमित्त भगवान् के दक्षिण वक्ष पर श्रीवत्स की आकृति में विश्राम करती है ॥ ३५ ॥ वही भोगरूपा शक्ति हैं। वे कल्पवृक्षादि नौ निधियों में निवास करने वाली हैं। वे भगवद्भक्तों की इच्छा अथवा अनिच्छापूर्वक भी नित्य नैमित्तिक कर्म से यज्ञादि कर्म, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, चिन्तन, समाधि आदि के द्वारा उपासना करने वालों को उपभोगार्थ विभिन्न भोगों को सम्पादित करती हैं। वही भगवद् विग्रह के पूजनादि की सामग्रियों, तीर्थ-जलों, अन्नों, रसों आदि का भी सम्पादन करती हैं ॥ ३६ ॥ अथातो वीरशक्तिश्चतुर्भुजाऽभयवरदपद्मधरा किरीटा- भरणयुता सर्वदेवैः परिवृता कल्पतरुमूले चतुर्भिर्गजै रत्नघटैरमृत- जलैरभिषिच्यमाना सर्वदेवैस्तैर्ह्लादिभिर्वन्द्यमाना अणिमाद्यष्टै- श्वर्ययुक्ता संमुखे कामधेनुनास्तूयमाना वेदशास्त्रादिभिः स्तूयमाना जयाद्यप्सरस्सखीभिः परिचर्यमाणा आदित्यसोमाभ्यां दीपाभिः प्रकाशिष्यमाणा तुम्बुरुनारदादिभिर्गीयमाना राकासिनोवालीभ्यां छत्रेण ह्लादिनीमयाभ्यां चामरेण स्वाहास्वधाभ्यां व्यजनेन भृगु- पुण्यादिभिरभ्यर्थ्यमाना देवी दिव्यसिंहासने पद्मासनारूढा सकल- कारणकार्यकरी लक्ष्मीर्देवस्य पृथग्भवनकल्पनालं चकार स्थिरा प्रसन्नलोचना सर्वदैवतैः पूज्यमाना वीरलक्ष्मीरिति विज्ञायत इत्युपनिषत् ॥ ३७ ॥ श्रीसीताजी का वीर शक्ति रूप चार भुजाओं से युक्त है। उनके हाथों में वरमुद्रा अभयमुद्रा और दो कमल सुशोभित हैं। किरीट-मुकुटों से और अन्य अलंकारों से अलंकृत हैं। चार श्वेत हाथी रत्नजटित कलशों के द्वारा अमृत-जल से उनका अभिषेक करते हैं। सब देवता

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